रबीउल आलम,अटल भारत टीवी न्यूज,संपादक
उधवा। लाइक्स की चमक कुछ पल की होती है, मंजिल की रोशनी उम्रभर साथ रहती है। यह पंक्ति आज के दौर में युवाओं की बदलती सोच और जीवनशैली पर सटीक बैठती है। सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव के बीच बड़ी संख्या में युवा फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और अन्य प्लेटफॉर्म पर फॉलोअर्स बढ़ाने, वायरल होने और ऑनलाइन कमाई की चाह में घंटों रील्स बनाने और पोस्ट करने में जुटे हुए हैं। क्षेत्र में देखा जा रहा है कि कई छात्र-छात्राएं पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी से अधिक समय मोबाइल स्क्रीन पर बिता रहे हैं। सड़क, बाजार, सार्वजनिक स्थानों और यहां तक कि शैक्षणिक संस्थानों के आसपास भी युवा वीडियो और रील्स बनाते नजर आ जाते हैं। लाइक्स, कमेंट और व्यूज की बढ़ती संख्या उनके लिए सफलता का पैमाना बनती जा रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि सोशल मीडिया का उपयोग गलत नहीं है, लेकिन जब यह पढ़ाई, परिवार और जिम्मेदारियों से अधिक महत्वपूर्ण हो जाए तो चिंता का विषय बन जाता है। कई युवाओं की दिनचर्या अब मोबाइल के इर्द-गिर्द सिमटती जा रही है। इसका असर उनकी एकाग्रता, शैक्षणिक प्रदर्शन और भविष्य की योजनाओं पर भी पड़ रहा है। कुछ शिक्षकों का मानना है कि सोशल मीडिया पर सफलता पाने वाले चुनिंदा लोगों को देखकर युवा यह सोचने लगते हैं कि प्रसिद्धि और पैसा आसानी से हासिल किया जा सकता है। इसी कारण वे शिक्षा और कौशल विकास की ओर कम ध्यान दे रहे हैं। हालांकि वास्तविकता यह है कि सोशल मीडिया पर सफलता पाने वालों की संख्या बेहद सीमित होती है, जबकि अधिकांश लोग केवल समय और ऊर्जा खर्च कर देते हैं। अभिभावकों ने भी चिंता जताई है कि बच्चों का किताबों, खेलकूद और रचनात्मक गतिविधियों से लगाव कम होता जा रहा है। परिवार के साथ संवाद भी पहले की तुलना में घटा है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि सोशल मीडिया का उपयोग ज्ञान, जागरूकता और सकारात्मक संदेशों के प्रसार के लिए होना चाहिए, न कि केवल दिखावे और लोकप्रियता की दौड़ के लिए।युवाओं को चाहिए कि वे तकनीक का उपयोग संतुलित ढंग से करें और अपने समय का बड़ा हिस्सा शिक्षा, कौशल विकास तथा रोजगार के अवसरों की तैयारी में लगाएं। क्योंकि असली सफलता लाइक्स और फॉलोअर्स से नहीं, बल्कि मेहनत, ज्ञान और अच्छे चरित्र से मिलती है।




