धान की खेती के बाद खेतों को परती छोड़ने के बजाय बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (BAU) ने विविधीकृत खेती को बढ़ावा देने की नई रणनीति पेश की है. जानें कैसे यह किसानों की आय बढ़ाएगा.
रांची. बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) में मंगलवार को 46वीं रबी अनुसंधान परिषद की बैठक हुई. बैठक में राज्य के करीब 10 लाख हेक्टेयर धान के परती खेतों में चरणबद्ध तरीके से विविधीकृत खेती को बढ़ावा देने की रणनीति तैयार करने पर जोर दिया गया. कृषि सचिव अबूबकर सिद्दीख पी ने वैज्ञानिकों से ऐसी तकनीक विकसित करने का आह्वान किया, जो किसानों की जरूरत के अनुरूप, कम लागत वाली और स्थानीय कृषि व्यवस्था में आसानी से लागू की जा सके.
ऑनलाइन बैठक को संबोधित करते हुए कृषि सचिव ने कहा कि विश्वविद्यालय के शोध का उद्देश्य किसानों की आय और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार करना होना चाहिए. उन्होंने कहा कि शोध केवल शोध पत्रों, प्रयोगशालाओं या कृषि संग्रहालयों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसका लाभ व्यापक स्तर पर किसानों तक पहुंचना जरूरी है.
धान के बाद परती खेतों में विविधीकृत खेती पर जोर
कृषि सचिव ने कहा कि राज्य में धान की खेती के बाद बड़ी मात्रा में खेत परती रह जाते हैं. ऐसे खेतों में चरणबद्ध तरीके से दूसरी फसलों और विविधीकृत खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रभावी कार्ययोजना तैयार करने की जरूरत है.
उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) को फसल सुधार, मृदा प्रबंधन, पौधा संरक्षण, जल संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के अनुकूल कृषि तकनीकों को किसानों तक पहुंचाने में सक्रिय भूमिका निभाने का निर्देश दिया.
अक्टूबर के बाद शुरू होने वाले जल संकट पर चिंता
भारतीय कृषि जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइएबी), नामकुम के निदेशक डॉ सुजय रक्षित ने कहा कि झारखंड में पर्याप्त बारिश होने के बावजूद अक्टूबर के बाद कई क्षेत्रों में जल संकट की स्थिति बनने लगती है. इससे निबटने के लिए वर्षा जल संचयन, जल संरक्षण और पुनर्चक्रण पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. उन्होंने खेती में पानी की बचत के लिए स्प्रिंकलर और ड्रिप जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा देने पर भी जोर दिया.
बेहतर फसल प्रबंधन पर जोर
बीएयू के कुलपति डॉ एससी दुबे ने वैज्ञानिकों से नवाचारपूर्ण विचारों, शोध प्रस्तावों और गुणवत्तापूर्ण अनुसंधान के माध्यम से विश्वविद्यालय की पहचान राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत करने का आह्वान किया.
उन्होंने कहा कि शोध में देर से बोई जाने वाली और कम अवधि में तैयार होने वाली जलवायु अनुकूल किस्मों के चयन के साथ फसल प्रबंधन, पौधा संरक्षण और कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने जैसी तकनीकों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए.
वैज्ञानिकों की कमी दूर करने में सहयोग
बैठक में बीएयू में वैज्ञानिक मानव संसाधन की कमी का मुद्दा भी उठा. डॉ सुजय रक्षित ने बताया कि आइआइएबी और बीएयू के बीच पहले से समझौता ज्ञापन (एमओयू) है. इसके तहत आइआइएबी सहयोगात्मक आधार पर अपने वैज्ञानिकों की सेवाएं बीएयू को उपलब्ध करा सकता है.
सेवानिवृत्त वैज्ञानिक और प्रगतिशील किसान सम्मानित
कार्यक्रम में सेवानिवृत्त वैज्ञानिक डॉ शंभूनाथ करमाकर, डॉ मणिगोपा चक्रवर्ती और डॉ अरविंद कुमार को सम्मानित किया गया. 31 दिसंबर को सेवानिवृत्त होने वाले डॉ डीएन सिंह और प्रो डीके रूसिया तथा अगले वर्ष 31 मार्च को सेवानिवृत्त होने वाले डॉ शैलेश चट्टोपाध्याय को भी शॉल और स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया. प्रगतिशील किसानों में सिलागाईं, चान्हो की गुड़िया कुमारी और खखरा, बुंडू के प्यारे लाल महतो को सम्मानित किया गया.
अनुसंधान उपलब्धियों की पुस्तिका का विमोचन
निदेशक अनुसंधान डॉ पीके सिंह ने अतिथियों का स्वागत करते हुए पिछले वर्ष की रबी अनुसंधान उपलब्धियों का प्रतिवेदन प्रस्तुत किया. इस अवसर पर अनुसंधान उपलब्धियों से संबंधित प्रकाशन का विमोचन किया गया. इसके अलावा डॉ आईए अंसारी, डॉ छाया और वंदना चौबे द्वारा लिखित पुस्तिका ‘अकोला लघु दाल मिल से दलहन का प्रसंस्करण’ का भी विमोचन किया गया.



