धालभूमगढ़: झारखंड आंदोलन में अहम भूमिका निभाने वाले चुकरीपाड़ा निवासी चरण हांसदा का निधन हो गया। जिंदगी के आखिरी पड़ाव तक उन्हें उस पेंशन का इंतजार रहा, जिसके वे एक चिह्नित झारखंड आंदोलनकारी होने के नाते हकदार थे। आर्थिक तंगी और बीमारी के बीच रविवार को झाड़ग्राम में इलाज के दौरान उनका निधन हो गया।
चरण हांसदा पिछले करीब एक सप्ताह से बीमार चल रहे थे। रविवार को तबीयत ज्यादा बिगड़ने पर परिजन उन्हें इलाज के लिए झाड़ग्राम ले गए, जहां इलाज के दौरान उन्होंने दम तोड़ दिया। उनके निधन की खबर मिलते ही क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई।
चिह्नित आंदोलनकारी होने के बावजूद नहीं मिली पेंशन
चरण हांसदा के सहयोगी लखन हांसदा के अनुसार, चरण झारखंड आंदोलन के चिह्नित आंदोलनकारी थे। इसके बावजूद उन्हें जीवनभर आंदोलनकारी पेंशन का लाभ नहीं मिल सका।
पेंशन नहीं मिलने के कारण परिवार को आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ा। आजीविका चलाने के लिए चरण हांसदा किसान मित्र के रूप में काम करते थे। बीमारी और आर्थिक तंगी के बीच भी परिवार को उम्मीद थी कि उन्हें उनका हक मिलेगा, लेकिन यह इंतजार कभी पूरा नहीं हुआ।
झामुमो से भी लंबे समय तक जुड़े रहे
चरण हांसदा सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी सक्रिय रहे। वे लंबे समय तक झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) से जुड़े रहे और पार्टी में पूर्व पंचायत सचिव की जिम्मेदारी भी निभाई। पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच उनकी सक्रियता और समर्पण को याद किया जा रहा है।
पार्थिव शरीर पर चढ़ाया झामुमो का झंडा
चरण हांसदा के निधन की सूचना मिलने के बाद सोमवार को झामुमो नेताओं और कार्यकर्ताओं ने उनके घर पहुंचकर श्रद्धांजलि दी। नेताओं ने उनके पार्थिव शरीर पर पुष्प अर्पित किए और पार्टी का झंडा ओढ़ाकर अंतिम सम्मान दिया। झामुमो प्रखंड अध्यक्ष अर्जुन हांसदा भी प्रखंड कमेटी के सदस्यों के साथ उनके आवास पहुंचे। उन्होंने कहा कि चरण हांसदा पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता थे और पार्टी के लिए उनके योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा।
पत्नी और दो बेटों को छोड़ गए पीछे
चरण हांसदा अपने पीछे पत्नी मादो हांसदा और दो पुत्र निर्मल हांसदा एवं सुबल हांसदा को छोड़ गए हैं। उनके निधन से परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। श्रद्धांजलि देने वालों में चैतन्य मुर्मू, विक्रम सोरेन, पीरुष हांसदा, मंगल हांसदा, धीरेन पाल, मनसाराम मुंडा और रंजीत हांसदा समेत कई लोग शामिल रहे।
एक आंदोलनकारी की अधूरी रह गई आस
चरण हांसदा की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति के निधन की खबर नहीं, बल्कि उस इंतजार की कहानी भी है जिसमें एक चिह्नित झारखंड आंदोलनकारी अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों तक अपने अधिकार की पेंशन का इंतजार करता रहा। उनके निधन के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति और आंदोलनकारियों के लिए पेंशन व्यवस्था को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं।
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