झारखंड में ब्रेन स्ट्रोक के 93.7% मरीज गोल्डन आवर में अस्पताल नहीं पहुंच पाते. रिम्स के शोध में सामने आए गंभीर आंकड़े, जो जानलेवा साबित हो सकते हैं.
रांची: झारखंड में ब्रेन स्ट्रोक (लकवा) के मरीजों के इलाज को लेकर रिम्स में हुए शोध में चिंताजनक तथ्य सामने आये हैं. अध्ययन के मुताबिक, राज्य में स्ट्रोक के केवल 6.3 प्रतिशत मरीज ही शुरुआती साढ़े चार घंटे यानी ‘गोल्डन आवर’ के भीतर अस्पताल पहुंच पाते हैं. हर 16 मरीजों में से केवल एक मरीज ही समय पर सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल पहुंच पाता है. बाकी 93.7 प्रतिशत मरीज जरूरी समय बीत जाने के बाद अस्पताल पहुंचते हैं. इससे उनका जीवनरक्षक ‘थ्रोम्बोलिसिस’ (नस खोलने का इंजेक्शन) से इलाज नहीं हो पाता है. इस साल विश्व स्ट्रोक दिवस की थीम ‘द टाइम इज नाउ’ (समय अभी है) है. इसका उद्देश्य स्ट्रोक के मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाने के प्रति जागरूक करना है.
रिम्स के शोध में 1,562 मरीजों की हुई जांच
रिम्स के न्यूरोलॉजी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. सुरेंद्र कुमार के मार्गदर्शन में तन्नू कुमारी, युवराज सिन्हा और उनकी टीम ने वर्ष 2022 से 2024 के बीच यह शोध किया. इसे प्रसिद्ध न्यूरोलॉजी जर्नल ‘एनल्स ऑफ न्यूरोसाइंसेज’ में प्रकाशित किया गया है.
शोध में स्ट्रोक के कुल 1,562 मरीजों की जांच की गयी. इनमें एक्यूट इस्केमिक स्ट्रोक (दिमाग की नस बंद होने) के 237 मरीज शामिल थे. इनमें से केवल 15 मरीज ही शुरुआती साढ़े चार घंटे के भीतर अस्पताल पहुंचे, जबकि 222 मरीज यानी लगभग 94 प्रतिशत मरीज जरूरी समय सीमा समाप्त होने के बाद अस्पताल पहुंचे.
70% मरीज ग्रामीण इलाकों से, 49% निरक्षर
शोध में पाया गया कि मरीजों में 70 प्रतिशत ग्रामीण इलाकों से आये थे, जबकि 49 प्रतिशत निरक्षर थे. जागरूकता के अभाव के कारण केवल 14 प्रतिशत लोग ही स्ट्रोक के शुरुआती लक्षणों, जैसे मुंह टेढ़ा होना, हाथ में कमजोरी और बोलने में दिक्कत, के बारे में जानते थे. वहीं, केवल 5.5 प्रतिशत लोगों को थ्रोम्बोलिसिस के बारे में जानकारी थी.
स्ट्रोक में गोल्डन आवर क्यों है अहम
ब्रेन स्ट्रोक के मरीजों के लिए शुरुआती साढ़े चार घंटे बेहद महत्वपूर्ण होते हैं. इस अवधि में अस्पताल पहुंचने पर पात्र मरीजों को थ्रोम्बोलिसिस के जरिये उपचार दिया जा सकता है. लेकिन देर से अस्पताल पहुंचने पर यह उपचार संभव नहीं हो पाता है. ऐसे में स्ट्रोक के शुरुआती लक्षणों की पहचान और मरीज को तुरंत अस्पताल पहुंचाना जरूरी है.



