फगुआ नृत्य बिहार की एक प्राचीन लोक परंपरा है, जो फाल्गुन मास में बसंत के स्वागत और अच्छी फसल के …और पढ़ें
नई दिल्ली। आज हम जिन भोजपुरी गानों और डांस को देखते हैं, उसे ही बिहार की असल संस्कृति मान लेते हैं। हालांकि, असलियत इससे कहीं ज्यादा अलग है। असल में बिहार की संस्कृति यहां की लोक कला में बसती है, जिसमें फगुआ लोक नृत्य भी शामिल है।
बिहार का यह लोक नृत्य फाल्गुन के महीने में किया जाता है। ये लोक नृत्य बिहार के गांव-देहात के इलाकों से शुरू हुआ था। फगुआ के लोकगीतों पर लोग ये खास नृत्य करते हैं। ये डांस इतना मजेदार होता है कि लोगों के मन को जोश और उमंग से भर देता है, लेकिन क्या आप जानते इस नृत्य की शुरुआत कैसे हुई? आइए जानें बिहार के फगुआ नृत्य की शुरुआत कैसे हुई और ये इतना खास क्यों है।
फगुआ नृत्य की शुरुआत कैसे हुई?
फगुआ नृत्य बिहार की संस्कृति से जुड़ा है। फगुआ शब्द फाल्गुन महीने से बना है और इसलिए इसे फाल्गुन के महीने में किया जाता है। फाल्गुन का महीना बसंत ऋतु के आने का होता है। इसलिए बसंत के स्वागत के लिए फगुआ डांस किया जाता है।
इस महीने में खेतों में फसल भी पक चुकी होती है। इसलिए माना जाता है कि अच्छी फसल के लिए धन्यवाद कहने और जश्न मनाने के लिए फगुआ नृत्य किया जाता था। किसान अच्छी फसल के लिए नाचते-गाते हुए भगवान का धन्यवाद कहते और साथ मिलकर खुशी मनाते थे। इसी से फगुआ नृत्य की शुरुआत हुई।
इस नृत्य की एक मान्यता होली से जुड़ी है। प्रह्लाद और होलिका की कहानी से इस नृत्य की शुरुआत मानी जाती है। बुराई पर अच्छाई की जीत और भगवान नरसिंह के लिए भक्ति जाहिर करने के लिए गांव के लोग एक साथ इकट्ठा होकर नाचते गाते थे। वक्त के साथ इस नृत्य में लोकगीत, नगाड़े और रंग शामिल हो गए, जिससे फगुआ नृत्य शुरू हुआ और आज तक हर फाल्गुन के महीने में किया जाता है।
क्यों किया जाता है फगुआ नृत्य?
फगुआ नृत्य को प्रकृति से जोड़कर देखा जाता है। सर्दी की विदाई और वसंत के आगमन की खुशी मनाने के लिए फगुआ किया जाता है। किसान अपने खेतों में लहलहाती फसलों की खुशी मनाने के लिए ये नृत्य करते हैं और भगवान को धन्यवाद कहते हैं।
होली के त्योहार पर होने वाला फगुआ समाज के सभी भेदभावों को भुलाकर एक साथ खुशी मनाने का संकेत देता है। लोग एक साथ इकट्ठा होकर इस नृत्य को करते हैं।
फगुआ नृत्य की खासियत
फगुआ नृत्य खुशी से जुड़ा होता है। इसलिए इसके गीत और डांस स्टेप्स एनर्जी से भरपूर होते हैं। ढोल-नगाड़े की तेज ताल पर फगुआ नृत्य की शुरुआत होती है। इस नृत्य के साथ गाए जाने वाले गीतों को होरी कहा जाता है। इन गीतों में राधा-कृष्ण के प्रेम, राम-सीता की होली और गांव के जीवन से जुड़े हंसी-मजाक का जिक्र होता है।
फगुआ को मुख्य रूप से सिर्फ पुरुष किया करते थे। एक पुरुष महिला का भेष लेता और बाकी नृतक उसके आस-पास घूमते हुए नृत्य करते। इस नृत्य के लिए नृतक साधारण धोती-कुर्ता पहनते और गुलाल और रंगों में डूबकर फगुआ नृत्य करते।



