झारखंड में हाथियों का आतंक मचा है. खेतों, गांवों और घरों तक पहुंचे हाथियों के झुंड से मानव-संघर्ष बढ़ा है. जानें पूरी कहानी.
रांची. झारखंड में सितंबर के दौरान जंगली हाथियों की आवाजाही ने एक बार फिर मानव-हाथी संघर्ष की चुनौती सामने ला दी है. राज्य के अलग-अलग इलाकों में हाथियों के झुंड खेतों, गांवों और आबादी वाले क्षेत्रों तक पहुंचे. कहीं तैयार फसल को नुकसान हुआ, कहीं मकान क्षतिग्रस्त हुए और कुछ घटनाओं में लोगों की जान चली गयी.
इसी दौरान लातेहार के बालूमाथ में हाथियों से फसल और घर को बचाने के लिए लगाये गये बिजली के तार की चपेट में आने से एक हाथी की मौत हो गयी. इस घटना ने मानव-हाथी संघर्ष का दूसरा पहलू भी सामने रखा है. जहां हाथियों की मौजूदगी ग्रामीणों के लिए जान और फसल का खतरा पैदा करती है, वहीं उन्हें रोकने के लिए अपनाये गये असुरक्षित तरीके वन्यजीवों के लिए भी जानलेवा साबित हो सकते हैं.
गिरिडीह में झुंड से बिछड़े हाथी ने बुजुर्ग दंपती पर किया हमला
गिरिडीह के पीरटांड़ क्षेत्र में सितंबर में झुंड से अलग हुए एक हाथी ने बुजुर्ग दंपती पर हमला कर दिया. घटना में मंगरा मांझी की मौत हो गयी, जबकि उनकी पत्नी बड़की देवी गंभीर रूप से घायल हो गयी.
वन विभाग के अनुसार हाथी करीब 30 हाथियों के झुंड से अलग हुआ था, जो धनबाद के टुंडी क्षेत्र की ओर से गिरिडीह पहुंचा था. घटना के बाद वन विभाग ने इलाके में निगरानी बढ़ायी और ग्रामीणों को रात में सावधानी बरतने की सलाह दी. पीरटांड़ क्षेत्र में इससे पहले भी हाथियों के झुंड के गांवों और धान के खेतों तक पहुंचने की घटनाएं सामने आती रही है.
धनबाद में 25 हाथियों के झुंड ने फसल और मकान को पहुंचाया नुकसान
धनबाद के बरवाअड्डा क्षेत्र के भोलीमारा गांव में करीब 25 हाथियों का झुंड पहुंच गया. हाथियों ने खेतों में लगी तैयार धान की फसल को रौंद दिया. इसके बाद झुंड आबादी वाले हिस्से में पहुंचा और एक मकान की दीवार को क्षतिग्रस्त कर दिया. मकान में मौजूद परिवार के सदस्यों ने समय रहते बाहर निकलकर खुद को सुरक्षित किया. घटना के बाद वन विभाग ने ग्रामीणों को सतर्क रहने की सलाह दी.
धनबाद के डीएफओ विकास पालीवाल के अनुसार हाथी आम तौर पर अपने निर्धारित आवागमन मार्गों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन अनाज या अन्य खाद्य सामग्री की गंध उन्हें आबादी की ओर खींच सकती है. उन्होंने ग्रामीणों से रात में अनाज रखने वाली जगहों के पास नहीं सोने की अपील की.
टुंडी में हाथी के हमले में शिक्षक की मौत
धनबाद के टुंडी क्षेत्र में भी हाथी के हमले में सहायक शिक्षक गिरजा मुर्मू की मौत हो गयी. उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार हाथियों का झुंड गांव के पास मक्का के खेत में मौजूद था. हाथियों के वहां से चले जाने का अनुमान लगाकर शिक्षक खेत की ओर गये थे. इसी दौरान झुंड ने उन पर हमला कर दिया. घटना हाथियों की मौजूदगी वाले इलाकों में बिना पूरी जानकारी के रात या सुबह खेतों की ओर जाने के जोखिम को सामने लाती है.
गढ़वा में तीन एकड़ से अधिक मक्का की फसल बर्बाद
गढ़वा के रंका अनुमंडल के तेतरडीह गांव में करीब 15 हाथियों का झुंड रात में खेतों तक पहुंच गया. हाथियों ने किसानों की तैयार मक्का की फसल खायी और उसे रौंद दिया. रिपोर्ट के अनुसार तीन एकड़ से अधिक क्षेत्र में लगी फसल को नुकसान हुआ. फसल तैयार होने के समय हुआ नुकसान किसानों के लिए ज्यादा गंभीर है, क्योंकि इससे खेती में लगी लागत के साथ संभावित आमदनी पर भी असर पड़ता है.
सिमडेगा में ब्लॉक कार्यालय और साप्ताहिक बाजार तक पहुंचा हाथी
सिमडेगा के बोलबा प्रखंड में 29 सितंबर को एक हाथी ब्लॉक कार्यालय परिसर और आसपास के साप्ताहिक बाजार तक पहुंच गया. हाथी करीब दो घंटे तक इलाके में रहा. इसके बाद वह जेठूबेड़ा जंगल की ओर चला गया. हाथी के बाजार क्षेत्र में पहुंचने की सूचना मिलते ही लोग सुरक्षित स्थानों की ओर चले गए. वन विभाग ने भी लोगों से हाथी से दूरी बनाये रखने की अपील की. घटना में किसी के घायल होने या संपत्ति को नुकसान पहुंचने की सूचना नहीं है.

बालूमाथ में बिजली के तार की चपेट में आने से हाथी की मौत
मानव-हाथी संघर्ष का गंभीर दूसरा पहलू लातेहार के बालूमाथ में सामने आया. झाबर पंचायत के कोमर गांव के कुसी टोला में एक जंगली हाथी बिजली के तार की चपेट में आ गया और उसकी मौत हो गयी. यह घटना सितंबर की शुरुआत में हुई थी. वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार खेत और घर को हाथियों से बचाने के लिए अवैध रूप से बिजली का तार लगाया गया था. हाथी उसी तार के संपर्क में आया, जिससे उसकी मौत हो गयी. क्षेत्रीय मुख्य वन संरक्षक एसआर नटेशा ने जिम्मेदार लोगों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराने का निर्देश दिया था. यह घटना दिखाती है कि हाथियों को रोकने के लिए खुले या करंट प्रवाहित तार जैसे असुरक्षित उपाय इंसानों के साथ-साथ वन्यजीवों के लिए भी गंभीर खतरा बन सकते हैं.

सिर्फ हाथियों को एक जगह से दूसरी जगह खदेड़ना पर्याप्त नहीं
इन घटनाओं को एक साथ देखने पर मानव-हाथी संघर्ष की चुनौती कई स्तरों पर सामने आती है. हाथी जब खेत या आबादी में पहुंचते हैं तो फसल, मकान और लोगों की सुरक्षा प्रभावित होती है. वहीं उन्हें रोकने के लिए असुरक्षित उपाय अपनाये जाने पर हाथियों की जान भी खतरे में पड़ सकती है.
ऐसे में किसी झुंड को केवल एक इलाके से दूसरे इलाके की ओर खदेड़ना स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता. हाथियों की आवाजाही वाले क्षेत्रों की पहचान, उनकी गतिविधियों की निगरानी और संवेदनशील गांवों में समय पर सूचना पहुंचाना जरूरी है. साथ ही हाथियों के पारंपरिक आवागमन वाले रास्तों और कॉरिडोर के संरक्षण पर भी ध्यान देना होगा.
समय पर सूचना से कम हो सकता है जोखिम
किसी गांव या खेत के आसपास हाथियों की मौजूदगी की सूचना मिले तो ग्रामीणों को खुद उन्हें भगाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. हाथियों के करीब जाकर फोटो या वीडियो बनाना, उन्हें घेरना या उनका रास्ता रोकना जोखिम बढ़ा सकता है. खासकर रात के समय खेत या जंगल की ओर जाने से पहले हाथियों की मौजूदगी की जानकारी लेना जरूरी है. स्थानीय स्तर पर वन विभाग और ग्रामीणों के बीच सूचना तंत्र मजबूत होने से हाथियों की गतिविधि के बारे में लोगों को समय पर चेतावनी दी जा सकती है.
इंसान और हाथी दोनों की सुरक्षा जरूरी
सितंबर की इन घटनाओं से स्पष्ट है कि झारखंड में मानव-हाथी संघर्ष जंगल की सीमा तक सीमित नहीं है. हाथी खेतों, घरों, बाजारों और सरकारी परिसरों तक पहुंच रहे हैं. दूसरी ओर, उनसे बचाव के लिए अपनाये गये कुछ असुरक्षित उपाय हाथियों की जान के लिए भी खतरा बन रहे हैं. इसलिए समाधान का केंद्र ग्रामीणों की सुरक्षा और हाथियों के संरक्षण दोनों को बनाना होगा. संवेदनशील इलाकों में निगरानी, समय पर अलर्ट, सुरक्षित तरीके से हाथियों को नियंत्रित करने की व्यवस्था और हाथी कॉरिडोर का संरक्षण जैसे उपायों पर एक साथ ध्यान देना जरूरी है.



