रांची: नक्सल विरोधी अभियानों के लिए पहचाने जाने वाले झारखंड जगुआर ने पर्यावरण संरक्षण और जल संचयन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय उदाहरण पेश किया है। टेंडरग्राम स्थित करीब 200 एकड़ के कैंपस में कभी पानी और हरियाली दोनों की भारी कमी थी। पथरीली जमीन पर 800 फीट तक बोरिंग कराने के बावजूद पानी नहीं मिल पाता था। आज उसी परिसर में करीब 100 फीट की गहराई पर पानी उपलब्ध हो रहा है।
इस बदलाव के पीछे वर्षों से चल रहा पौधरोपण, तालाब निर्माण और बारिश के पानी को जमीन में पहुंचाने का प्रयास अहम माना जा रहा है।
पत्थरों से घिरी जमीन बनी ग्रीन कैंपस
झारखंड जगुआर का गठन वर्ष 2008 में हुआ था। इसके बाद टेंडरग्राम में बल को करीब 200 एकड़ जमीन मिली। शुरुआती समय में यह इलाका काफी पथरीला था और यहां पहले पत्थर की खदानें भी संचालित होती थीं।
भूजल स्तर बेहद नीचे होने के कारण कैंपस में रहने वाले जवानों और उनके परिवारों के सामने पानी की समस्या बड़ी चुनौती थी। लगातार किए गए संरक्षण कार्यों ने धीरे-धीरे हालात बदल दिए।
18 साल से लगातार पौधरोपण
कैंपस में पिछले करीब 18 वर्षों से हर मानसून पौधरोपण अभियान चलाया जा रहा है। अलग-अलग वर्षों में हजारों पौधे लगाए गए। वर्ष 2025 में करीब 10 हजार पौधे, जबकि 2026 में भी लगभग 5 हजार पौधे लगाए गए।
अधिकारियों के अनुसार, पूरे परिसर में अब 20 लाख से अधिक पेड़-पौधे मौजूद हैं। इस बड़े ग्रीन कवर से न केवल वातावरण बेहतर हुआ है, बल्कि बारिश के पानी को जमीन में पहुंचाने में भी मदद मिली है।
तालाबों की श्रृंखला ने बदली पानी की तस्वीर
जल संरक्षण के लिए कैंपस में छह से सात बड़े तालाब तैयार किए गए हैं। बारिश के दौरान पानी को इन तालाबों में जमा किया जाता है। बाद में यही पानी धीरे-धीरे जमीन में रिसकर भूजल स्तर को बढ़ाने में मदद करता है।
झारखंड जगुआर के अधिकारियों के मुताबिक, जल संरक्षण की रणनीति मुख्य रूप से दो बातों पर केंद्रित रही—बारिश के पानी को रोकना और ग्रीन कवर बढ़ाना।
800 फीट से घटकर 100 फीट हुई पानी की गहराई
कैंपस में हुए बदलाव का सबसे बड़ा संकेत भूजल स्तर में आया सुधार है। शुरुआती वर्षों में करीब 800 फीट तक बोरिंग के बाद भी पानी नहीं मिलता था, जबकि अब लगभग 100 फीट की गहराई पर पानी उपलब्ध हो रहा है।
अधिकारियों का मानना है कि तालाबों में पानी का संचयन और लंबे समय से चल रहा पौधरोपण अभियान इस बदलाव के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।
2300 लोगों को मिल रहा पानी
डीआईजी झारखंड जगुआर इंद्रजीत महता के अनुसार, कैंपस में जल संरक्षण को लगातार प्राथमिकता दी गई है। इसका फायदा अब यहां रहने वाले करीब 2300 पुलिसकर्मियों, अधिकारियों और उनके परिवारों को मिल रहा है।
जहां पहले पानी की उपलब्धता बड़ी चिंता थी, वहीं अब कैंपस में रहने और काम करने वाले लोगों को पानी के लिए पहले जैसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ रहा है।
पठारी इलाकों के लिए बन सकता है उदाहरण
आईजी झारखंड जगुआर अनूप बिरथरे के मुताबिक, झारखंड का बड़ा हिस्सा पठारी और पथरीला है। ऐसे इलाकों में भूजल संरक्षण एक चुनौती है। झारखंड जगुआर कैंपस में हुए प्रयोग को दूसरे क्षेत्रों के लिए भी उपयोगी मॉडल के तौर पर देखा जा सकता है।
उनका कहना है कि बारिश के पानी को तालाबों में रोकना और अधिक से अधिक क्षेत्र में हरियाली विकसित करना भूजल रिचार्ज के लिए प्रभावी तरीका हो सकता है।
नक्सल अभियान से पर्यावरण संरक्षण तक
झारखंड जगुआर के जवानों ने कठिन जंगलों में नक्सल विरोधी अभियानों के दौरान अपनी भूमिका निभाई है। अब इसी बल का टेंडरग्राम कैंपस जल संरक्षण और हरियाली के प्रयासों के लिए भी पहचान बना रहा है।
कभी पत्थरों और सूखेपन से जूझ रही जमीन पर आज पेड़-पौधे, तालाब और हरियाली दिखाई देती है। यही बदलाव झारखंड जगुआर कैंपस को सिर्फ पुलिस प्रशिक्षण परिसर नहीं, बल्कि बंजर भूमि को हरित क्षेत्र में बदलने और भूजल बढ़ाने की एक मिसाल बना रहा है।



