भागलपुर में 85 हजार से अधिक जीविका दीदियां लखपति बन चुकी हैं, जिन्होंने वित्तीय वर्ष 2025-26 का लक्ष्य समय से पहले ही पूरा कर लिया है।
भागलपुर। कभी घर-परिवार की जिम्मेदारियों तक सीमित रहने वाली महिलाओं के हाथों में अब रोजगार और कारोबार की कमान है। कोई पशुपालन से परिवार की आमदनी बढ़ा रही है तो कोई सिलाई, खाद्य प्रसंस्करण, किराना, कृषि आधारित गतिविधियों और छोटे उद्यमों के जरिये अपनी आर्थिक पहचान बना रही है।
भागलपुर में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी 85 हजार से अधिक जीविका दीदियां लखपति दीदी बन चुकी हैं। खास बात यह है कि वित्तीय वर्ष 2025-26 में जिले ने लखपति दीदी बनाने का निर्धारित लक्ष्य पूरा कर लिया है।
आय बढ़ी तो बढ़ी निर्णयों में भागीदारी
लखपति दीदी पहल का उद्देश्य महिलाओं को केवल ऋण या आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उन्हें सतत आजीविका के साधनों से जोड़कर परिवार की वार्षिक आय में स्थायी वृद्धि करना है।
स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता, बाजार से जोड़ने और स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
महिला की अपनी आमदनी बढ़ने से परिवार में शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और आवास जैसे खर्चों में उसकी भूमिका मजबूत हो रही है। आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ महिलाएं परिवार के निर्णयों में भी अधिक सक्रिय हो रही हैं।
आय को स्थायी बनाना अगली चुनौती
लखपति बनी महिलाओं की आमदनी को लगातार बनाए रखना अब महत्वपूर्ण है। इसके लिए उत्पाद की गुणवत्ता, बाजार की उपलब्धता, बेहतर पैकेजिंग, ब्रांडिंग और डिजिटल माध्यम से बिक्री पर और काम करने की जरूरत है। इससे छोटे स्तर पर शुरू किए गए उद्यमों को स्थायी कारोबार में बदला जा सकता है।
जीविका के डीपीएम सुरनिमल गेरेन के अनुसार, पहल का उद्देश्य ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत कर उन्हें परिवार की आय में हिस्सेदार से आगे आर्थिक निर्णयों की भागीदार बनाना है। भागलपुर में 85 हजार से अधिक महिलाओं का लखपति दीदी बनना इसी बदलाव का संकेत है।
समूह से मिली ताकत, संभाला संगठन का दायित्व
सबौर प्रखंड के बड़ी इब्राहिमपुर की मानुषी देवी करीब एक दशक पहले राधिका जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ी थीं। सक्रियता को देखते हुए समूह की महिलाओं ने उन्हें अध्यक्ष चुना। इसके बाद वह चिराग जीविका महिला संकुल स्तरीय संघ की अध्यक्ष बनीं।
वर्तमान में वह इस संकुल संघ से जुड़ी करीब सात हजार महिलाओं के साथ काम कर रही हैं। उनके संकुल संघ की ओर से जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में दीदी की रसोई का संचालन किया जा रहा है। इससे कई जीविका दीदियों को रोजगार मिला है।
मानुषी को बिहार राज्य जीविका निधि सहकारी साख समिति लिमिटेड के निदेशक मंडल की सदस्य बनने का भी अवसर मिला। उनका कहना है कि जीविका ने उनके साथ हजारों ग्रामीण महिलाओं को नई पहचान और आत्मविश्वास दिया है।
तैराकी के हुनर और जीविका से मिली नेतृत्व क्षमता
कहलगांव प्रखंड स्थित भविष्य जीविका महिला संकुल संघ की अध्यक्ष कुंदन देवी करीब एक दशक पूर्व विष्णु जीविका स्वयं सहायता समूह से जुड़ी थीं। पहले वह घरेलू कार्यों तक सीमित थीं, लेकिन अब उन्होंने अपनी पहचान सक्षम और आत्मनिर्भर महिला के रूप में बनाई है।
जीविका से जुड़ने के बाद न केवल उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई, बल्कि नेतृत्व क्षमता का भी विकास हुआ। कुंदन देवी की पहचान को नई दिशा देने में उनकी तैराकी की कला की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। बचपन से ही उन्हें तैराकी का अच्छा ज्ञान था।
आज वह कहलगांव स्थित एनटीपीसी के स्विमिंग सेंटर में महिलाओं और लड़कियों को तैराकी का प्रशिक्षण देती हैं। उनका मानना है कि तैराकी केवल खेल नहीं, बल्कि जीवन रक्षक कौशल भी है, खासकर ऐसे क्षेत्रों में जहां जल स्रोत अधिक हैं।
तैराकी के अलावा कुंदन देवी कपड़ा सिलाई का काम भी करती हैं। उन्होंने नाश्ते की दुकान भी शुरू की है, जिसका संचालन उनका बेटा करता है।
इस पहल का व्यापक उद्देश्य गांव की महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत कर उन्हें परिवार की आय में हिस्सेदार से आगे आर्थिक निर्णयों की भागीदार बनाना है। भागलपुर में 85 हजार से अधिक महिलाओं का लखपति दीदी बनना इसी बदलाव का संकेत है। – सुरनिमल गेरेन, डीपीएम जीविका भागलपुर



