पश्चिम बंगाल पुलिस के समक्ष हथियार डालने वाले प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) के पूर्व जोनल कमांडर रामप्रसाद मार्डी उर्फ सचिन ने पुलिस की पूछताछ में बताया कि वर्ष 2007 में जमशेदपुर के तत्कालीन सांसद सुनील महतो की हत्या हाई कमान
पश्चिम बंगाल पुलिस के समक्ष हथियार डालने वाले प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) के पूर्व जोनल कमांडर रामप्रसाद मार्डी उर्फ सचिन ने पुलिस की पूछताछ में बताया कि वर्ष 2007 में जमशेदपुर के तत्कालीन सांसद सुनील महतो की हत्या हाई कमान के निर्देश पर की गई। हत्याकांड में शामिल पटमदा के झुंझका निवासी सचिन ने संगठन की गतिविधियों के बारे में भी जानकारी दी।हत्याकांड में दर्जनभर नक्सली थे शामिल
नक्सली नेता ने पुलिस को बताया कि संगठन में बड़ी घटनाओं का निर्णय व्यक्तिगत स्तर पर नहीं लिया जाता था। पोलित ब्यूरो मेंबर (पीबीएम) और सेंट्रल कमेटी मेंबर (सीसीएम) स्तर पर ऐसे फैसले लिए जाते थे। सांसद हत्याकांड में वह शामिल था, लेकिन सुनील महतो को उसने गोली नहीं मारी थी। रंजीत पाल उर्फ राहुल समेत कई अन्य नक्सलियों ने सांसद पर गोली चलाई थी। घटना को दर्जनों नक्सलियों ने मिलकर अंजाम दिया था। घटना के बाद सचिन बंगाल के लालगढ़ चला गया था। लालगढ़ आंदोलन के दौरान वह करीब चार वर्षों तक नक्सली नेता किशनजी के साथ रहा। किशनजी के मारे जाने के बाद वह दोबारा झारखंड लौटा और पटमदा, एमजीएम, गालूडीह व घाटशिला में सक्रिय रहा। मार्च तक वह सारंडा में सक्रिय था, जिसके बाद दलमा लौट आया।पुलिस से हथियार लूटने के बावजूद लेवी से गोली खरीदते थे नक्सली
सचिन के मुताबिक, सांसद हत्याकांड के दौरान संगठन में उसका एक वर्ष ही बीता था। संगठन को उस दौर में लेवी के रूप में काफी रकम मिलती थी, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा गोलियां खरीदने में खर्च होता था। हथियारों की व्यवस्था अक्सर पुलिस जवानों से लूट के जरिए की जाती थी, जबकि गोलियां खरीदनी पड़ती थीं।एक गोली के लिए 500 रुपये होते थे खर्च
सचिन के अनुसार, एक गोली के लिए करीब 500 रुपये तक खर्च करने पड़ते थे। संगठन की रकम का इस्तेमाल वर्दी, पोशाक और दवाओं की खरीद में भी होती थी। उसने संगठन की रकम में से कभी एक पैसा घर नहीं भेजा। उसका मुख्य कार्य क्षेत्र बंगाल रहा, हालांकि उसने झारखंड के सारंडा, खूंटी और दलमा क्षेत्रों में भी काम किया। अनीता के संगठन छोड़कर बंगाल में सरेंडर करने के बाद 15 अगस्त से पहले ही उसने असीम मंडल उर्फ आकाश को भी छोड़ दिया था।दो साल तक सुरक्षित रहते थे हथियार
हथियारों को छिपाने की जिम्मेदारी मंगल और मालती को दी गई थी। हथियारों को पानी के पटवन में इस्तेमाल होने वाले डिलीवरी पाइप में डालकर जमीन में गाड़ दिया गया था। सचिन के मुताबिक, इस तरह हथियार करीब दो साल तक सुरक्षित रखे जा सकते हैं।



