Timul Dairy Products Bihar: तिमुल गोपालगंज के प्रसिद्ध थावे पिड़िकिया मिठाई को बड़े बाजार तक पहुंचाने की तैयारी कर रहा है। कम्फेड की मंजूरी के बाद अगले साल से इसकी पैकेजिंग और कीमत तय कर इसे बाजार में उतारा जाएगा।
मुजफ्फरपुर। Gopalganj Thawe Pidikiya Sweet: गोल- मटोल पिड़िकिया। कूट-कूट कर भरा गया खोया, चाशनी में तर-बतर। मुंह में डालते ही घुलती वर्षों की परंपरा…!
यह है गोपालगंज के थावे धाम की पहचान, जिसे तिमुल (तिरहुत दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड) के माध्यम से बड़े बाजार तक पहुंचाने की तैयारी है।
कम्फेड की मंजूरी का इंतजार
क्षेत्रीय मिठाई को देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाने की दिशा में तिमुल ने इसका ट्रायल पूरा कर लिया है। प्रोसेसिंग रिपोर्ट कम्फेड (बिहार स्टेट मिल्क को-आपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड) को सौंप दी गई है।
कम्फेड से स्वीकृति मिलने के बाद इसकी पैकेजिंग और कीमत तय की जाएगी। इस प्रोजेक्ट पर पिछले दो वर्षों से काम चल रहा था। इस अंतराल में थावे जाकर उत्पादन की प्रक्रिया को भी देखा, समझा गया।
अगले साल मार्केट में आने की संभावना
तिमुल के प्रबंध निदेशक फूल कुमार झा बताते हैं कि अगले साल से पिड़िकिया को लोगों तक पहुंचाने की योजना है। इससे थावे में तैयार करने वाले स्थानीय कारीगरों को रोजगार भी मिलेगा।
उन्होंने बताया कि तिमुल अपने क्षेत्राधिकार में आने वाले जिलों की क्षेत्रीय मिठाइयों को पहचान दिलाने के लिए लगातार काम कर रहा।
इससे पहले सीतामढ़ी के रुन्नीसैदपुर की बालूशाही को भी बाजार उपलब्ध कराने की पहल की गई थी। तिमुल की ब्रांडिंग के बाद वहां दर्जनों दुकानों के माध्यम से रोजगार की नई चेन बनी है।

बुलाए गए थे थावे के कारीगर
पिड़िकिया के ट्रायल के लिए थावे से स्थानीय कारीगरों को बुलाया गया था। पहली बार 20 किलो पिड़िकिया तैयार कर इसका परीक्षण किया गया।
इसे मैदा, खोया, घी और चीनी मिलाकर तैयार किया गया। 20 किलो पिड़िकिया तैयार करने में करीब चार हजार रुपये का खर्च आया था। इसमें मजदूरी और बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली रसोई गैस का खर्च भी शामिल है।
कीमत का निर्धारण नहीं
बाजार में उतारने के समय इसकी कीमत तय की जाएगी। इसमें परिवहन खर्च के साथ विक्रेता का मुनाफा भी शामिल रहेगा।
तिमुल के प्लांट प्रबंधक दीपक कुमार के अनुसार, ट्रायल सफल रहा है। पिड़किया का स्वाद भी लाजवाब पाया गया। अभी यहां बालूशाही, पेड़ा, गुलाबजामुन, चमचम, रसकदम, मिल्क केक, कलाकंद, सोनपापड़ी आदि की पैकिंग हो रही।
300 से एक हजार किलो की खपत
थावे में मिठाई बनाने वाले गौरीशंकर साह के पोते सुशील कुमार गुप्ता ने कहा कि उनके दादा वर्ष 1964 से पिड़िकिया बना रहे थे। उनके निधन के बाद भी यह कारोबार जारी है।
पहले यहां एक दुकान थी, अब दो दर्जन से अधिक हैं। यहां 240 से 380 रुपये किलो तक पिड़िकिया की बिक्री होती है।
थावे के मिठाई कारोबारी राकेश यादव ने कहा कि तिमुल ने यहां के कारीगर को बुलाकर अपने स्तर पर पिड़िकिया का ट्रायल कराया है। इससे स्थानीय कारीगरों को लाभ मिलेगा।
उन्होंने बताया कि थावे में प्रतिदिन करीब डेढ़ से दो लाख रुपये की पिड़िकिया की बिक्री होती है। प्रतिदिन करीब 500 से 1000 किलो तक इसकी खपत होती है।



