धमधमियां के 60 साल पुराने काली मंदिर में 8 नवंबर को विशेष पूजा और 9 नवंबर को ऐतिहासिक आदिवासी मेले का आयोजन होगा.
तीनपहाड़ : तीनपहाड़ मुख्यालय से महज 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित धमधमियां गांव के रेलवे परिसर का काली मंदिर पूरे क्षेत्र में अटूट आस्था का केंद्र बना हुआ है. यहाँ पिछले 60 वर्षों से भी अधिक समय से मां काली की पूजा पूरी भव्यता और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ होती आ रही है. इस प्राचीन मंदिर का इतिहास बेहद दिलचस्प है और यहाँ की पूजा में रेलवे कर्मचारियों व स्थानीय ग्रामीणों का आपसी सहयोग इसकी सबसे बड़ी मिसाल है. इस साल भी 8 नवंबर को मां की विशेष पूजा का आयोजन होगा, जिसके बाद 9 नवंबर को विशाल आदिवासी मेला लगाया जाएगा.
60 साल से अधिक पुराना है इतिहास
धमधमियां निवासी खुदीराम ने मंदिर के शुरुआती दिनों की यादें साझा करते हुए बताया कि यहाँ मां काली की पूजा 60 साल से भी अधिक समय से हो रही है. शुरुआत में यहाँ पूजा के लिए कोई पक्का मंदिर नहीं था. ग्रामीण ईंट रखकर और तिरपाल लगाकर अस्थाई रूप से पंडाल बनाते थे और आस्था के साथ पूजा की जाती थी. उस दौर में हर साल मिट्टी की भव्य मूर्ति बनाई जाती थी और पूजा संपन्न होने के बाद पारंपरिक रूप से मूर्ति का विसर्जन कर दिया जाता था.
तत्कालीन स्टेशन प्रबंधक बी. माल्टो का रहा बड़ा योगदान
स्थानीय ग्रामीणों और समर्पित रेल कर्मियों के संयुक्त प्रयास से साल 1985-86 में यहाँ पक्के मंदिर का निर्माण कराया गया. मंदिर बनने के बाद पूजा और भी ज्यादा भव्य तरीके से होने लगी. हालांकि, मंदिर बनने के बाद भी कई वर्षों तक मिट्टी की मूर्ति बनाकर ही पूजा होती रही. लगभग 5-6 साल पहले मंदिर में मां काली की स्थाई प्रतिमा स्थापित की गई. इस स्थाई प्रतिमा का निर्माण उस समय के तत्कालीन स्टेशन प्रबंधक बी. माल्टो द्वारा करवाया गया था. स्थाई प्रतिमा स्थापित होने के बाद से अब मिट्टी की मूर्ति नहीं बनाई जाती है, बल्कि पूजा के बाद सिर्फ कलश का विसर्जन किया जाता है.
स्थानीय निवासी प्रदीप कुमार राम ने बताया कि यह पूजा शुरू से ही स्टेशन प्रबंधक और ग्रामीणों के आपसी सहयोग से चलती आ रही है. रेलवे परिसर में स्थित होने के कारण रेल विभाग का इसमें विशेष लगाव रहता है. मंदिर में पूजा पहले कल्याणचक के कांतेश पंडित जी के द्वारा अनेक वर्षों तक संपन्न कराई जाती रही, लेकिन पिछले कुछ समय से उनकी तबीयत खराब होने के कारण उनका आना बंद हो गया. इस वजह से वर्तमान समय में पिछले लगभग 3 सालों से दरला ग्राम के पुरोहित संजय बाबा के द्वारा मां की पूजा पूरी विधि-विधान से कराई जा रही है.
आसपास के दर्जनों गांवों से आते हैं सैकड़ों लोग
इस मंदिर में होने वाले ऐतिहासिक आदिवासी मेले का भी अपना एक विशेष और अलग महत्व है. यह मेला पिछले 50 वर्षों (पांच दशकों) से लगातार लगता आ रहा है. इस मेले में पोखरिया, पिलगुट्टू, साँवलापुर, धमधमियां, छोटा दुर्गापुर, निमगाछी सहित आसपास के कई गांवों से सैकड़ों लोगों का बड़ा जुटान होता है. क्षेत्र में यह मान्यता है कि इस मंदिर में जो भी भक्त सच्चे मन से मां काली के सामने मुराद मांगता है, मां उसकी झोली कभी खाली नहीं रखतीं और हर मन्नत पूरी होती है.



