हाईकोर्ट ने हजारीबाग के सोनू साव की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए उसे जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया.
रांची : एक नाबालिग की जमानत को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए झारखंड हाईकोर्ट ने कहा है कि केवल इस आशंका के आधार पर जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता कि रिहा होने पर नाबालिग का संपर्क अपराधियों से हो सकता है. जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की एकल पीठ ने हजारीबाग के सोनू साव की आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई करते हुए यह टिप्पणी की.
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता राजेश कुमार तिवारी, विश्वनाथ मून और रितेश कुमार ने पैरवी की, जबकि राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता विजय कुमार सिन्हा ने दलीलें पेश कीं. कोर्ट ने निचली अदालतों के जमानत खारिज करने के आदेशों को रद्द करते हुए नाबालिग को जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया.
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 12 का हवाला
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि Juvenile Justice( Care and Protection of Children) Act, 2015 की धारा 12 के तहत विशेष परिस्थिति में ही जमानत रोकी जा सकती है. किसी नाबालिग को जमानत तभी रोकी जा सकती है, जब उसके रिहा होने से किसी ज्ञात अपराधी के संपर्क में आने, नैतिक, शारीरिक या मनोवैज्ञानिक खतरे में पड़ने या न्याय के उद्देश्यों के विफल होने की उचित आशंका के समर्थन में ठोस आधार मौजूद हों.
17 साल के सोनू पर कार का शीशा तोड़ने का आरोप
याचिका के मुताबिक सोनू साव कथित घटना के समय करीब 17 वर्ष का था. उसके खिलाफ लोहरसिंघना थाना कांड संख्या 01/2026 में भारतीय न्याय संहिता की अलग अलग धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया था. वह 12 जनवरी 2026 से हिरासत में था.
याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि उसके खिलाफ मुख्य आरोप बोलेरो गाड़ी का विंडस्क्रीन तोड़ने का है. वह 11वीं कक्षा का छात्र है और सोशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट में भी उसके खिलाफ कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं की गई है. उसके पिता ने भी आश्वासन दिया था कि वह बेटे के आचरण की जिम्मेदारी लेंगे और उसे आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के संपर्क में नहीं आने देंगे.
राज्य सरकार ने जमानत का किया विरोध
राज्य सरकार की ओर से जमानत का विरोध करते हुए दलील दी गई कि आरोपी अन्य लोगों के साथ घटना में शामिल था. इस घटना में एक व्यक्ति की मौत हुई थी, जबकि दो अन्य घायल हुए थे. राज्य की ओर से मामले की गंभीरता को देखते हुए जमानत नहीं देने का पक्ष रखा गया.
निचली अदालतों ने जताई थी ये आशंका
इससे पहले हजारीबाग जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने 24 फरवरी 2026 को सोनू की जमानत याचिका खारिज कर दी थी. इसके बाद अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-सह-विशेष न्यायाधीश, चाइल्ड कोर्ट, हजारीबाग ने 26 मार्च 2026 को भी जमानत देने से इनकार कर दिया था. दोनों अदालतों ने आशंका जताई थी कि रिहा होने पर नाबालिग का संपर्क ज्ञात अपराधियों से हो सकता है और वह नैतिक, शारीरिक या मनोवैज्ञानिक खतरे में पड़ सकता है. इन्हीं आदेशों को सोनू की ओर से हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी.
ठोस आधार के बिना जमानत से इनकार उचित नहीं
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि निचली अदालतों ने अपराधियों के संपर्क में आने की आशंका के आधार पर जमानत खारिज की थी, जबकि सामाजिक जांच रिपोर्ट में आरोपी के खिलाफ कोई प्रतिकूल तथ्य सामने नहीं आया था. कोर्ट ने कहा कि बिना एविडेंस के यह नहीं कहा जा सकता कि उसकी रिहाई से न्याय के उद्देश्य भी फल हो जाएंगे.
कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत है जमानत खारिश करने के लिए तीनों संभावित परिस्थितियों पर कारण बताने में विफल रही हैं. हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल आशंका के आधार पर नाबालिग को जमानत से वंचित नहीं किया जा सकता. इसके लिए कानून में निर्धारित परिस्थितियों के समर्थन में उचित आधार होना जरूरी है.
दोनों आदेश रद्द, पिता की जमानत पर रिहाई का निर्देश
हाईकोर्ट ने हजारीबाग जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के 24 फरवरी 2026 और स्पेशल चाइल्ड कोट के 26 मार्च 2026 के आदेशों को निरस्त कर दिया. इसके साथ ही आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए सोनू साव को उनके पिता के आश्वासन के आलोक में जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया.
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि रिहाई जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड की ओर से निर्धारित शर्तों के अधीन होगी. इस फैसले में हाईकोर्ट ने दोहराया कि नाबालिगों की जमानत पर विचार करते समय केवल आशंका नहीं, बल्कि कानून में निर्धारित आधारों और उपलब्ध सामग्री का आकलन जरूरी है.



