साहिबगंज में दुर्गा पूजा के दौरान गंगा-जमुनी तहजीब की अनूठी मिसाल देखने को मिलती है, जहाँ एक मुस्लिम कारीगर मोहम्मद रफीक रावण का पुतला बना रहे हैं. यह कला और भाईचारे का संगम है.
साहिबगंज -त्योहार भले ही अलग-अलग हों, लेकिन कला और आपसी भाईचारे का रिश्ता हर मजहब से ऊपर होता है. साहिबगंज जिला मुख्यालय स्थित सिद्धू-कान्हू स्टेडियम में प्रत्येक वर्ष दुर्गा पूजा के अवसर पर आयोजित होने वाले रावण वध कार्यक्रम में इसकी खूबसूरत मिसाल देखने को मिलती है. यहां रावण का पुतला बनाने की जिम्मेदारी शहर के रसूलपुर दहला निवासी मोहम्मद रफीक निभा रहे हैं. उनके हाथों से तैयार होने वाला रावण का पुतला विजयादशमी के आयोजन का प्रमुख आकर्षण बनता है.
60 फीट ऊंचा बन रहा रावण का पुतला
60 फीट ऊंची प्रतिमा व पटाखे में डेढ़ लाख का बजट है. मोहम्मद रफीक पूरे समर्पण के साथ रावण के पुतले को आकार देने में जुटे हैं. पुतला तैयार होने के बाद रावण वध कार्यक्रम के दौरान पटाखों के माध्यम से उसका दहन किया जाता है. इस आयोजन में जहां लोग बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश लेते हैं. वहीं एक मुस्लिम कारीगर द्वारा इस कार्य में योगदान देना सामाजिक सौहार्द और आपसी विश्वास की मिसाल भी पेश करता है.
गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक है परंपरा
कार्यक्रम के आयोजक चंदेश्वर प्रसाद सिन्हा ने बताया कि सिद्धू-कान्हू स्टेडियम में प्रत्येक वर्ष रावण वध कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है. मोहम्मद रफीक द्वारा रावण का पुतला तैयार किया जाना गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी भाईचारे का संदेश देता है. भारत की सांस्कृतिक परंपरा की यही खूबसूरती है कि लोग एक-दूसरे के त्योहारों और आयोजनों से जुड़कर सामाजिक एकता को मजबूत करते हैं.
कला जोड़ती है दिलों को
मोहम्मद रफीक का यह योगदान बताता है कि कला की कोई धार्मिक सीमा नहीं होती. त्योहारों से जुड़ी ऐसी परंपराएं समाज में एकता, सद्भाव और परस्पर सम्मान की भावना को मजबूत करती हैं. सिद्धू-कान्हू स्टेडियम में होने वाला रावण वध कार्यक्रम केवल धार्मिक आयोजन ही नहीं, बल्कि साहिबगंज की साझा संस्कृति और भाईचारे का संदेश देने वाला अवसर भी है.



