झारखंड के जंगलों में मादा बाघिन की कमी के कारण बाघ स्थायी ठिकाना नहीं बना पा रहे हैं। पिछले तीन सालों में आए छह नर बाघ कुछ महीनों बाद लौट गए, जिससे राज्य के वन बाघ विहीन हो गए हैं।
रांची। राज्य के वनों में अभी कोई बाघ नहीं है। जबकि गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में बाघ की संख्या बढ़ी है झारखंड के जंगलों में किसी बाघ का नहीं होना चिंता की बात है। पिछले तीन साल में करीब छह नए बाघ दूसरे वन्यक्षेत्र से झारखंड के जंगलों में पहुंचे।
तीन महीने से लेकर सालभर तक राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों में घूमते रहे लेकिन उनका स्थायी ठिकाना यहां नहीं बन पाया। वन्यजीव विशेषज्ञ इसके लिए सबसे बड़ी वजह मादा बाघिन का नहीं रहना बताते हैं। अभी तक झारखंड आने वाले सभी बाघ नर हैं।
झारखंड के जंगलों में मानसून बाद की गई गणना के मुताबिक किसी बाघ के होने का चिह्न नहीं मिला है। खास बात यह है कि पलामू समेत सभी हिस्सों में बाघ के लिए पूरी आहार श्रृंखला मौजूद है।
बाघ के व्यवहार पर अध्ययन करने वाले शमशाद आलम ने बताया कि यह शानदार जीव बिना जोड़ी के नहीं टिकता है। इसे लंबे समय तक अधिवास के लिए मादा सहयोगी चाहिए जो यहां नहीं मिलने से यह लौट जा रहा है।
क्यों नहीं आ रही मादा बाघिन
वन्यजीव विशेषज्ञ शमशाद आलम ने बताया कि पड़ोसी राज्य छत्तीसगढ़ से नर बाघों की संख्या बढ़ी है और इनमें प्रतिस्पर्धा हो रही है। इससे झुंड से बिछड़ा नर बाघ झारखंड के जंगल तक पहुंच जा रहा है। लेकिन मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के जंगलों में मादा बाघिन को पर्याप्त संख्या में नर साथी मिल जा रहे हैं।
इस वजह से अपनी सीमा से बाहर जाने की उनको आवश्यकता नहीं होती है। लातेहार में अगले साल तक टाइगर सफारी बनाने की तैयारी हो रही है। प्राकृतिक परिवेश में बाघों को रखकर इनके बीच से ही मादा बाघिन को खुले जंगल में छोड़ने के बाद बाघों को स्थायी तौर पर टिकने की संभावना है।



