पीरो अनुमंडल के जेठवार गांव के अरुणेश कुमार मधुकर ने नौकरी का इंतजार छोड़ आधुनिक तकनीक से बटन मशरूम उत्पादन इकाई स्थापित कर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है।
हसन बाजार (पीरो)। नौकरी की तलाश में वर्षों तक भटकने के बजाय तकनीक, मेहनत और सरकारी योजनाओं का सही इस्तेमाल किया जाए तो गांव में भी रोजगार का मजबूत आधार तैयार किया जा सकता है।
इस सोच को हकीकत में बदलने का काम पीरो अनुमंडल के जेठवार गांव निवासी अरुणेश कुमार मधुकर ने किया है। वे आज एक मिसाल बन गए हैं।
दसवीं तक पढ़ाई करने के बाद उन्होंने नौकरी का इंतजार करने के बजाय खेती में व्यवसाय की संभावनाएं तलाशीं और आज आधुनिक तकनीक से बटन मशरूम उत्पादन की इकाई संचालित कर आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश कर रहे हैं।
अरुणेश ने बताया कि मशरूम उत्पादन की शुरुआती जानकारी उन्हें यूट्यूब से मिली। बाद में एक मित्र ने उन्हें इसे व्यवसाय के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित किया।
जानकारी को केवल देखने-सुनने तक सीमित रखने के बजाय उन्होंने इसे धरातल पर उतारने का निर्णय लिया। शुरुआती प्रयासों से अनुभव हासिल किया और धीरे-धीरे मशरूम उत्पादन को आधुनिक एवं व्यवस्थित इकाई का रूप दे दिया।
नियंत्रित वातावरण में हो रहा बटन मशरूम का उत्पादन
अरुणेश की मशरूम उत्पादन इकाई करीब 40 फीट लंबी और 17 फीट चौड़ी है। इसे इंसुलेशन पैनल से तैयार किया गया है, जिससे अंदर का तापमान नियंत्रित रखा जा सके।
अनुकूल तापमान बनाए रखने के लिए एसी की व्यवस्था भी की गई है। नियंत्रित वातावरण में यहां बड़े पैमाने पर बटन मशरूम का उत्पादन किया जाता है।
एक चक्र में करीब दो हजार बैग लगाए जाते हैं। उत्पादन शुरू होने के बाद लगभग 25 दिनों तक फलन प्राप्त होता है, जबकि बटन मशरूम को पूरी तरह तैयार होने में करीब 35 से 40 दिन लगते हैं।
वैज्ञानिक तरीके से तापमान और वातावरण को नियंत्रित कर कम जगह में भी उत्पादन की संभावना तैयार की गई है।
गेहूं की भूसी से कोकोपीट तक का इस्तेमाल
मशरूम उत्पादन के लिए तैयार किए जाने वाले कंपोस्ट में गेहूं की भूसी, कोकोपीट, चोकर, गेहूं सहित अन्य आवश्यक सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है।
अरुणेश के अनुसार, मशरूम उत्पादन के लिए जरूरी स्पॉन कोलकाता से मंगाया जाता है। एक बार कंपोस्ट डालने पर करीब 40 क्विंटल तक उत्पादन की क्षमता बताई गई है। पूरी प्रक्रिया में तापमान और वातावरण को अनुकूल बनाए रखना महत्वपूर्ण होता है।
सरकारी योजना से मिला आर्थिक संबल
इकाई को आधुनिक रूप देने में प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम उन्नयन योजना का भी सहयोग मिला। योजना के तहत करीब 10 लाख रुपये की सहायता और 35 प्रतिशत सब्सिडी का लाभ मिलने से अरुणेश को आधुनिक उत्पादन इकाई तैयार करने में आर्थिक मदद मिली।
सरकारी सहायता से उनके शुरुआती प्रयास को गति मिली और सीमित संसाधनों में शुरू किया गया काम व्यवस्थित उद्यम के रूप में आगे बढ़ सका।
युवाओं के लिए रोजगार की नई राह
अरुणेश की कहानी केवल मशरूम उत्पादन तक सीमित नहीं है। यह उन ग्रामीण युवाओं के लिए भी उदाहरण है, जो रोजगार की तलाश में गांव से शहरों की ओर जाने को मजबूर होते हैं।



