झारखंड हाईकोर्ट ने कोल माइंस प्रोविडेंट फंड के 727.67 करोड़ रुपये डीएचएफएल में डूबने के मामले में सीबीआई जांच का आदेश दिया है. यह राशि कर्मचारियों के भविष्य निधि से जुड़ी है, जिसकी निष्पक्ष जांच अब केंद्रीय एजेंसी करेगी.
Jharkhand High Court: कोल माइंस प्रोविडेंट फंड ऑर्गेनाइजेशन यानी CMPFO के करोड़ों रुपये के नुकसान के मामले में झारखंड हाईकोर्ट ने गंभीर नाराजगी जतायी है. चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने 10 सितंबर को मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि CMPFO को सैकड़ों करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है और इसकी जिम्मेदारी तय करने से पहले ही एक अधिकारी को लगभग क्लीनचिट दे दी गयी. अदालत ने इस मामले में केंद्र के कोयला मंत्रालय, CMPFO और CBI से जवाब मांगा है. मामले की अगली सुनवाई 8 अक्टूबर को निर्धारित की गयी है.
DHFL में 1300 करोड़ रुपये के निवेश का मामला
यह मामला Coal Employees Welfare Association, Dhanbad की ओर से दायर जनहित याचिका से जुड़ा है. याचिका में आरोप लगाया गया है कि CMPFO की राशि में से 1300 करोड़ रुपये Dewan Housing Finance Corporation Limited यानी DHFL में निवेश किये गये थे. याचिकाकर्ताओं का कहना है कि विशेषज्ञों और फंड मैनेजरों की सलाह के बावजूद समय रहते राशि वापस नहीं निकाली गयी. इससे CMPFO को करीब 727.67 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ.
CBI और ED से कार्रवाई की मांग
याचिकाकर्ताओं ने मामले में जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने और कार्रवाई की मांग की है. इसके साथ ही नुकसान की भरपाई कराने के लिए भी अदालत से उचित निर्देश देने का अनुरोध किया गया है. पिछली सुनवाई में अदालत ने पूछा था कि क्या मामले में FIR या किसी अन्य तरह की आपराधिक कार्रवाई शुरू की गयी है.
जांच पूरी होने से पहले अधिकारी को क्लीनचिट पर सवाल
अदालत के निर्देश के बाद CMPFO के क्षेत्रीय आयुक्त-II पंकज कुमार की ओर से हलफनामा दाखिल किया गया. इसमें बताया गया कि DHFL से संबंधित मामला कोयला मंत्रालय की जांच के अधीन है और जांच अधिकारी अपनी रिपोर्ट दे चुके हैं. वहीं, पूर्व CMPFO आयुक्त अनिमेष भारती को 17 मई 2024 को प्रमुख दंड संबंधी आरोपपत्र या मेमोरेंडम जारी किये जाने की जानकारी दी गयी. लेकिन हलफनामे में यह भी कहा गया कि मामला Insolvency and Bankruptcy Code के तहत प्रक्रिया से उत्पन्न व्यावसायिक नुकसान है और CMPFO अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक साजिश या आपराधिक विश्वासघात का मामला नहीं बनता. इस पर हाईकोर्ट ने कड़ी आपत्ति जतायी.
अदालत ने कहा, निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी
खंडपीठ ने कहा कि विभागीय कार्रवाई या आंतरिक सतर्कता जांच पूरी होने से पहले ही किसी अधिकारी को लगभग दोषमुक्त करने वाला प्रमाणपत्र कैसे जारी किया जा सकता है. अदालत ने इस निष्कर्ष की कड़ी आलोचना की. कोर्ट ने कहा कि सैकड़ों करोड़ रुपये के नुकसान को केवल व्यावसायिक नुकसान बताकर आपराधिक पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
जांच शुरू करने में भी देरी पर सवाल
अदालत ने यह भी नोट किया कि अब तक कोई FIR दर्ज नहीं की गयी है और केवल आंतरिक सतर्कता जांच की बात कही गयी है. कोर्ट ने कहा कि किसी प्रशासनिक प्राधिकरण के पास आपराधिक कार्रवाई शुरू करने का विवेकाधिकार हो सकता है, लेकिन यह अधिकार मनमाना या बिना किसी दिशा-निर्देश के इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.
कोयला मंत्रालय और CBI से मांगा जवाब
हाईकोर्ट ने कोयला मंत्रालय के सचिव और संयुक्त सचिव सह वित्तीय सलाहकार को हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया. साथ ही CMPFO से जुड़े संबंधित अधिकारियों और CBI को भी जवाब दाखिल करने को कहा गया. अदालत जानना चाहती है कि क्या मामले से जुड़े सभी दस्तावेज प्रशासनिक मंत्रालय के सामने रखे गये हैं और क्या आपराधिक कार्रवाई या FIR दर्ज करने का कोई प्रस्ताव है.
जांच को लेकर कोर्ट ने जतायी गंभीर चिंता
खंडपीठ ने टिप्पणी की कि याचिका दाखिल होने के बाद ही जांच शुरू करने की औपचारिकता की गयी हो, ऐसी प्रथम दृष्टया स्थिति हलफनामे से सामने आती है. अदालत ने यह भी कहा कि वह यह सुनिश्चित करना चाहती है कि आरोपपत्र जारी करने की कार्रवाई वास्तविक जांच के उद्देश्य से हुई है या मामले को दबाने और अधिकारियों को बचाने की कोशिश की जा रही है.
सीबीआई जांच पर टिकी सबकी नजर
मामला कर्मचारियों के भविष्य निधि से जुड़ी बड़ी राशि का है. इसलिए हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई जांच पर अब सबकी नजर रहेगी. खास बात यह है कि अदालत ने केवल राशि की वसूली के सवाल तक मामले को सीमित नहीं रखा, बल्कि पूरे घटनाक्रम की जांच का रास्ता खोल दिया है. करोड़ों की रकम का हिसाब-किताब अब फाइलों से निकलकर जांच एजेंसी की मेज पर पहुंच गया है.



