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Atal Bharat News > झारखंड > 26 सितंबर 1995 की वो काली रात, जब गजलीटांड खदान में समा गए थे 64 खनिक; आज भी अधूरे हैं जांच के वादे

26 सितंबर 1995 की वो काली रात, जब गजलीटांड खदान में समा गए थे 64 खनिक; आज भी अधूरे हैं जांच के वादे

Priyanka Kumari
Last updated: 2026/09/25 at 12:48 PM
Priyanka Kumari
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धनबाद के कतरास स्थित गजलीटांड खदान में 26 सितंबर 1995 को कतरी नदी के उफान से आई जलसमाधि में 64 खनिकों की जान चली गई थी। इस भीषण हादसे के 31 साल बाद भी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं हुई और पीड़ित परिवारों को न्याय का इंतजार है।

कतरास (धनबाद)। धनबाद कोयलांचल के इतिहास में 26 सितंबर की तारीख एक ऐसा कभी न मिटने वाला जख्म है, जिसकी टीस तीन दशक बीतने के बाद भी वैसी ही बनी हुई है। वर्ष 1995 में इसी तारीख को आई भयानक आपदा में पूरे धनबाद के 79 खनिकों की जान चली गई थी।

Contents
जब आसमानी आफत बनी काल, रिकॉर्ड 331 मिमी बारिश से टूटी थी कतरी नदी की दीवार‘कोर्ट ऑफ इंक्वायरी’ का छलावा, मंत्री बदले, सरकारें बदलीं… फाइलों से बाहर नहीं आया सचसालों से निभाई जा रही औपचारिकता, बलिदानी स्तंभ पर हर साल जुड़ते हैं सिर्फ रटे-रटाए भाषणआज भी अनुत्तरित हैं सवाल, आखिर कौन सी मानवीय भूलों ने ली थी खनिकों की बलि?

इनमें से अकेले कतरास क्षेत्र की गजलीटांड खदान में 64 श्रमवीरों ने भूमिगत खदान की गहराइयों में जलसमाधि ले ली थी। इतने बड़े विनाश को आज भी ‘एक्ट ऑफ गॉड’ का पर्दा डालकर फाइलों में समेट दिया गया है।

जब आसमानी आफत बनी काल, रिकॉर्ड 331 मिमी बारिश से टूटी थी कतरी नदी की दीवार

26 सितंबर 1995 को कतरास इलाके में मूसलाधार बारिश का नया रिकॉर्ड दर्ज हुआ था, जहां महज कुछ घंटों में 331 मिलीमीटर बारिश हुई। खदान के करीब बहने वाली कतरी नदी जलस्तर बढ़ने से विकराल हो गई और पानी के भारी दबाव में नदी का सुरक्षा तटबंध टूट गया। नदी का बेकाबू पानी सीधे गजलीटांड खदान की गहराइयों में समाने लगा। चानक 6 में बिछी थीं लाशें, चानक 7 से मिली थी जिंदगी, खौफनाक रात की वो आपबीती

जब नदी का पानी खदान में घुसा, उस समय 6 नंबर चानक में दूसरी पाली के 64 मजदूर काम में जुटे थे, जिन्हें संभलने या भागने का कोई मौका नहीं मिला और पूरी खदान जलमग्न हो गई। चीख-पुकार के बीच सभी 64 मजदूरों की अंदर ही मौत हो गई। वहीं दूसरी तरफ, 7 नंबर चानक में मौजूद कुछ मजदूरों ने अपनी त्वरित सूझबूझ और अदम्य साहस का परिचय देते हुए किसी तरह सुरक्षित बाहर निकलने में सफलता पाई थी।बीसीसीएल पर पड़ा गहरा असर, कंगाली की कगार पर पहुंची थी कंपनी

इस भीषण हादसे ने खनन उद्योग के पूरे ढांचे को हिलाकर रख दिया। इसके बाद बीसीसीएल वित्तीय संकट में आकर बीआईएफआर में चली गई और कोयला खनन के तौर-तरीकों व सुरक्षा मानकों में भी बदलाव किया गया।

‘कोर्ट ऑफ इंक्वायरी’ का छलावा, मंत्री बदले, सरकारें बदलीं… फाइलों से बाहर नहीं आया सच

हादसे के तुरंत बाद भारत सरकार के तत्कालीन कोयला मंत्री जगदीश टाइटलर ने मामले की निष्पक्ष जांच के लिए सेवानिवृत्त जज के नेतृत्व में ‘कोर्ट ऑफ इंक्वायरी’ गठित की थी। परंतु वर्षों बीत जाने के बावजूद जांच की रिपोर्ट और उसके नतीजे आज तक सार्वजनिक नहीं हो सके।

सालों से निभाई जा रही औपचारिकता, बलिदानी स्तंभ पर हर साल जुड़ते हैं सिर्फ रटे-रटाए भाषण

हर वर्ष 26 सितंबर को गजलीटांड स्थित बलिदानी स्तंभ पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन होता है। अधिकारी और जनप्रतिनिधि आते हैं, मृतकों को नमन करते हैं और जांच व कार्रवाई का पुराना भाषण दोहराकर चले जाते हैं।

आज भी अनुत्तरित हैं सवाल, आखिर कौन सी मानवीय भूलों ने ली थी खनिकों की बलि?

हादसे के सालों बाद भी पीड़ित परिवारों की आंखों के आंसू नहीं सूखे हैं। बलिदानी स्तंभ पर माल्यार्पण और दो मिनट का मौन हर साल निभाया जाता है, लेकिन हादसे के असली कारणों और मानवीय भूलों पर आज भी पर्दा पड़ा हुआ है। यह सच आज भी बीसीसीएल के बंद कमरों से बाहर नहीं आ सका है। 

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