झारखंड के दिवंगत मंत्री सुदिव्य सोनू की सियासत में एंट्री कैसे हुई? जानिए एक छोटे ठेकेदार से मंत्री बनने तक का सफर और शिबू सोरेन से पहली मुलाकात की पूरी कहानी.
रांची : सुदिव्य कुमार सोनू की मौत के बाद से झारखंड की राजनीति में इस बात की चर्चा गर्म है कि उनकी जगह कौन लेगा. क्योंकि राज्य की राजनीति में उनकी पहचान केवल एक विधायक या मंत्री के तौर पर नहीं थी. वह लंबे समय से झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) संगठन के भरोसेमंद सिपाही के साथ साथ सीएम हेमंत सोरेन के लिए कठिन परिस्थियों में सलाहकार की भूमिका भी निभाते थे. लेकिन बहुत कम लोगों की इसकी जानकारी है कि वह झामुमो जॉइन करने से पहले क्या थे. आज हम आपको इस लेख में उनकी सियासी पारी शुरू करने से पहले की कहानी बताएंगे.
प्रारंभिक जीवन और साधारण शुरुआत
सुदिव्य सोनू का जन्म 26 जुलाई 1970 को एकीकृत बिहार के गिरिडीह जिले में हुई थी. वह (पीएचईडी) के इंजीनियर शंभू नाथ के सबसे छोटे पुत्र थे. पिता के स्थिर करियर के बावजूद, सुदिव्य ने अपने दम पर सफलता की राह तय की. झामुमो जॉइन करने से पहले वे गिरिडीह स्थित सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल) में एक छोटे ठेकेदार के रूप में काम किया. बाद में उन्होंने दामोदर वैली कॉर्पोरेशन (डीवीसी) और अन्य स्थानीय संगठनों के साथ भी विभिन्न पदों पर काम किया. शुरुआती वर्षों ने उन्हें इस क्षेत्र के औद्योगिक और खनन क्षेत्रों में कई परेशानियों का सामना करना पड़ा. लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा का सबसे दिलचस्प अध्याय साल 1989 में शुरू हुई जब डीएसपी बरनाड कीचिया के आवास पर सुदिव्य कुमार सोनू की पहली मुलाकात झामुमो के संस्थापक दिशोम गुरु शिबू सोरेन से हुई थी. उस दौरान उत्तर बिहार में पढ़ाई करते समय झारखंड अलग राज्य के आंदोलन को लेकर सुदिव्य सोनू बेहद चिंतित थे. दरअसल जब वे अपने साथियों से अलग राज्य गठन की बात करते थे तो उनके दोस्त उन्हें ताना मारत थे. जिससे उनके भीतर अपनी माटी के प्रति गहरा जुड़ाव पैदा हो चुका था. इस मुलाकात में जब शिबू सोरेन को पता चला कि सुदिव्य एक शिक्षित युवा हैं तो उन्होंने उनके कंधे पर हाथ रखकर कहा कि यदि उनके जैसे पढ़े-लिखे युवा अलग राज्य के आंदोलन में आगे नहीं आएंगे तो इसका विस्तार कैसे होगा? गुरु जी के इन शब्दों ने सुदिव्य के मन को गहराई से छू लिया और वे परिवार के विरोध के बावजूद झारखंड आंदोलन में कूद पड़े. जब आंदोलन आगे बढ़ा तो शिबू सोरेन खुद उनके घर पहुंचे और उनके पिता के पैर छूकर कहा, “आपका बेटा मांगकर ले जा रहे हैं, कुछ बना के देंगे.” गुरु जी की ये बात उनके पिता के संदेह को दूर कर दिया. यहीं से सुदिव्य सोनू ने करीब तीन दशक तक पार्टी में रहते हुए उन्होंने संगठन को न सिर्फ मजबूत किया बल्कि अलग राज्य की लड़ाई को धार दिया. इस दौरान उन्होंने कई उतार-चढ़ाव देखे. साल 2009 में उन्हें पहली बार गिरिडीह सीट से चुनाव लड़ने का मौका मिला लेकिन हार गए. वर्ष 2014 में भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा. फिर आया 2019, उन्होंने तीसरी बार झामुमो के टिकट पर गिरिडीह सीट चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की. उनकी जीत का सिलसिला यहीं नहीं रूका और 2024 के विधानसभा चुनाव में लगातार दूसरी बार जीत हासिल की. इस जीत के बाद उन्हें हेमंत सोरेन सरकार में मंत्री बनाया गया. उन्हें नगर विकास मंत्री, पर्यटन मंत्री और उच्च शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण विभाग सौंपे गए.
राजनीति में प्रवेश और पार्टी के प्रति अटूट निष्ठा
सुदिव्य कुमार ने साल 1989 में झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) की प्राथमिक सदस्यता लेकर सार्वजनिक जीवन में कदम रखा था. उनकी संगठनात्मक क्षमता ने जल्द ही वरिष्ठ नेतृत्व का ध्यान आकर्षित किया और 1992 तक उन्हें गिरिडीह टाउन जेएमएम इकाई का संस्थापक अध्यक्ष नियुक्त किया गया. ऐसे समय में जब राजनीतिक दल-बदल आम बात थी, सुदिव्य तीन दशकों से अधिक समय तक जेएमएम के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखे. उन्होंने पार्टी के वरिष्ठ नेता शिबू सोरेन के साथ एक गहरा पारिवारिक संबंध स्थापित किया, जो उन्हें दत्तक पुत्र के समान मानते थे. उनकी निष्ठा की परीक्षा 2004 में तब हुई जब शिबू सोरेन के खिलाफ एक हाई-प्रोफाइल कानूनी मामला खोला गया. उस समय जेएमएम के जिला अध्यक्ष के रूप में कार्यरत सुदिव्य ने दिशोम गुरु का दृढ़ता से साथ दिया और उन्हें बरी कराने के लिए पर्दे के पीछे अथक प्रयास किया.
चुनावी सफर से लेकर एक कुशल नेता के रूप में पहचान
सुदिव्य सोनू के विधानसभा तक पहुंचने में वर्षों का राजनीतिक धैर्य और संघर्ष शामिल था. उन्होंने 2009 में गिरिडीह से जेएमएम के टिकट पर अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ा. लेकिन नामांकन दाखिल करने के तुरंत बाद उन्हें गिरफ्तारी कर लिया गया. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी. भले ही उस चुनाव में वे जीत हासिल नहीं कर सके मगर जमीन पर लगातार संघर्ष करते रहे. वर्ष 2014 के विधानसभा में वे दूसरी बार चुनावी मैदान में थे. इस चुनाव में भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा. हालांकि उनकी लगन वर्ष 2019 के चुनाव में काम आई और उन्होंने पहली बार गिरिडीह सदर सीट से जीत हासिल की. इसके बाद 2024 के विधानसभा चुनाव में भी उन्होंने अपनी जीत का सिलसिला जारी रखा. अपने चुनावी अभियानों के अलावा सुदिव्य को जेएमएम के “चाणक्य” (कुशल रणनीतिकार) के रूप में भी जाना जाता था. उन्होंने गठबंधन बनाने और चुनावी रणनीतियों की योजना बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे जेएमएम के नेतृत्व वाले इंडिया ब्लॉक को 2024 में ऐतिहासिक रूप से लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल करने में मदद मिली.
हेमंत सरकार के संकट मोचक थे सुदिव्य सोनू
मंत्री के रूप में, सुदिव्य सोनू ने झारखंड के बुनियादी ढांचे को नए रूप देने के लिए कई बड़े प्रयास किए. अपने विधानसभा क्षेत्र गिरिडीह में उन्होंने एक स्थानीय विश्वविद्यालय, इंजीनियरिंग कॉलेज, चिड़ियाघर, बायोडायवर्सिटी पार्क और कई गांवों के लिए ड्रिंकिंग वाटर सप्लाई प्रोजेक्ट की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. उन्होंने सरकार के लिए मजबूत राजनीतिक ढाल और संकट मोचक के रूप में भी कार्य किया. जब राज्य की जेपीएससी और जेएसएससी परीक्षाओं में अनियमितता लेकर स्टूडेंट प्रोटेस्ट हुए, तो सुदिव्य ने ही आगे बढ़कर नेतृत्व किया और पीड़ित छात्र के समूहों से सीधी बातचीत की और मामले को शांति से सुलझाने में प्रयास किया.
निधन से थमा सफर लेकिन विरासत रहेगी कायम
6 सितंबर, 2026 को सुदिव्य कुमार सोनू का गिरिडीह स्थित उनके आवास पर अचानक हार्ट अटैक से 56 वर्ष की आयु में निधन हो गया. मौत से पहले उनके सीने में दर्द और बेचैनी की शिकायत हुई जिसके बाद 2:30 बजे स्थानीय अस्पताल ले जाया गया. कुछ समय बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. उनके असामयिक निधन से झारखंड के राजनीतिक जगत में गहरा शोक फैल गया.



