रांची हाईकोर्ट ने जल संसाधन विभाग के तीन जूनियर इंजीनियरों को 2012 से प्रोन्नति का लाभ देने का आदेश दिया है. विभाग के फैसले को कोर्ट ने निरस्त किया, जिससे उन्हें लाभ मिलेगा.
रांची : झारखंड हाईकोर्ट ने जल संसाधन विभाग के तीन जूनियन इंजीनियरों (मैकेनिकल) को 2012 से प्रोन्नति का लाभ देने का आदेश दिया है. जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने विभाग के उस आदेश को निरस्त कर दिया है, जिसके माध्यम से तीनों इंजीनियरों को 20 नवंबर 2012 से सहायक अभियंता के पद पर प्रोन्नति देने का दावा खारिज कर दिया गया था. अदालत ने राज्य सरकार को तीनों याचिकाकर्ताओं को 20 नवंबर 2012 से सहायक अभियंता (मैकेनिकल) के पद पर प्रोन्नति देने और सभी परिणामी लाभ प्रदान करने का निर्देश दिया है.
2018 में मिली थी प्रोन्नति, 2012 से लाभ की थी मांग
मामले में रॉबिन अजय सिंह, पंकज कुमार और संदीप कुमार ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. तीनों की नियुक्ति 13 नवंबर 2007 को स्वीकृत एवं रिक्त पदों के विरुद्ध कनीय अभियंता (मैकेनिकल) के पद पर हुई थी. याचिकाकर्ताओं के पास एएमआइई की डिग्री थी. उनका कहना था कि सेवा में पांच वर्ष की निर्धारित कालावधि पूरी करने के बाद वे नवंबर 2012 से सहायक अभियंता के पद पर प्रोन्नति के योग्य हो गये थे. इसके बावजूद विभाग ने उन्हें 20 नवंबर 2018 को प्रोन्नति दी.
पहली याचिका के बाद भी नहीं मिला था पूरा लाभ
प्रोन्नति में देरी को लेकर याचिकाकर्ताओं ने पहले भी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. वर्ष 2014 में दायर याचिका पर 10 नवंबर 2016 को आदेश पारित हुआ था. इसके बाद उन्हें 20 नवंबर 2018 को सहायक अभियंता के पद पर प्रोन्नति दी गयी. लेकिन, नवंबर 2012 से प्रोन्नति का लाभ नहीं मिलने पर उन्होंने फिर याचिका दायर की. इस पर 24 सितंबर 2025 को हाईकोर्ट ने विभागीय सचिव को अभिलेखों की जांच कर कारणयुक्त आदेश पारित करने और परिणामी लाभ देने का निर्देश दिया था.
तीन आधार पर विभाग ने खारिज किया था दावा
इसके बाद विभाग ने 19 जनवरी 2026 को उनका दावा खारिज कर दिया. विभाग ने इसके लिए सीबीआइ जांच लंबित होने, झारखंड इंजीनियरिंग सेवा नियुक्ति नियमावली 2016 और झारखंड सेवा संहिता के नियम 58 तथा झारखंड वित्त नियमावली के नियम 74 का हवाला दिया था. याचिकाकर्ताओं ने इस आदेश को चुनौती दी.
एफआईआर और आरोप पत्र नहीं किया गया दायर
याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता मनोज टंडन ने दलील दी कि नवंबर 2012 में उनके खिलाफ न तो प्राथमिकी दर्ज थी और न ही कोई आरोप पत्र दाखिल हुआ था. कोई विभागीय आरोप पत्र भी गठित नहीं किया गया था. सरकार के 20 नवंबर 2008 के संकल्प के अनुसार निलंबन, विभागीय कार्यवाही में आरोप गठित होने अथवा आपराधिक मामले में आरोप पत्र दाखिल होने की स्थिति में ही प्रोन्नति रोकी जा सकती है. अदालत ने इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि केवल प्रारंभिक सीबीआइ जांच लंबित होने के आधार पर प्रोन्नति रोकना उचित नहीं है. वर्ष 2016 की नियमावली भी नवंबर 2012 से लागू नहीं मानी जा सकती, क्योंकि इसे पूर्वव्यापी प्रभाव नहीं दिया गया था.
कार्यपालक अभियंता के पद पर भी प्रोन्नति पर होगा विचार
कोर्ट ने डॉ पारसनाथ प्रसाद बनाम बिहार राज्य समेत पूर्व के न्यायिक फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि नियोक्ता की गलती से हुई देरी को कर्मचारी के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. अदालत ने 19 जनवरी 2026 के विभागीय आदेश को रद्द करते हुए तीनों इंजीनियरों को नवंबर 2012 से सहायक अभियंता के पद पर प्रोन्नति और सभी परिणामी लाभ देने का आदेश दिया. इसके अलावा, सहायक अभियंता के पद पर प्रोन्नति मिलने के बाद तीनों के कार्यपालक अभियंता के पद पर प्रोन्नति के दावे पर भी निर्धारित कालावधि और लागू नियमों के अनुसार विचार करने का निर्देश दिया गया है. पूरी प्रक्रिया 12 सप्ताह में पूरी करनी होगी.



