Karma Lokgeet: झारखंड के गांवों में करमा पर्व की आहट के साथ ‘आज रे करम गोसाईं घरे दुआरे रे’ गीत गूंजने लगा है। यह लोकप्रिय लोकगीत प्रकृति, भाई-बहन के प्रेम और सुख-समृद्धि की कामना से जुड़े करमा पर्व की तैयारियों का अहम हिस्सा है।
धनबाद। Karam Gosain: ‘आज रे करम गोसाईं, घरे दुआरे रे…’ इन पंक्तियों के साथ झारखंड के गांवों में करमा पर्व की आहट महसूस होने लगी है। गांवों, पहाड़ों और खेतों की मेढ़ों से करम गीतों के स्वर सुनाई देने लगे हैं। इसी के साथ करमा पर्व का माहौल झारखंड के गांवों में बनने है।
महिलाएं और युवतियां समूह बनाकर गीतों का अभ्यास कर रही हैं। कहीं मांदर की थाप सुनाई दे रही है तो कहीं करमा नृत्य के लिए अखड़े सजने लगे हैं। प्रकृति, भाई-बहन के प्रेम और सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ा करमा पर्व झारखंड की लोक-संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
युवतियां और महिलाएं बुजुर्गों से पुराने करमा गीत सीख रहीं हैं। कई जगह शाम के समय खेतों की मेढ़ों, गांव के अखड़ों और पूजा स्थलों के आसपास गीतों का अभ्यास शुरू हो जाता है।
सबसे लोकप्रिय करमा गीतों में एक
‘आज रे करम गोसाईं, घरे द्वारे रे,
काल रे कांस नदी पारे रे।
आवते भादर मास, आनबो घुराय…
दे हो, दे हो करम गोसाईं, दे हो आशीष,
आज से करम गोसाईं…’
यूं तो करमा पर कई लोकगीत (Jharkhand Folk Song) गाए जाते हैं। इन गीतों पर सामूहिक नृत्य किया जाता है। लेकिन प्रचलित गीतों में-आज रे करम… सबसे लोकप्रिय गीतों में एक है। इसकी सरल धुन और सामूहिक गायन की शैली इसे खास बनाती है। करमा पर्व के दौरान ग्रामीण इलाकों में यह गीत लंबे समय से गाया जाता रहा है।
गीत में करम देवता के स्वागत और घर-आंगन में उनके आगमन का भाव दिखाई देता है। यही कारण है कि इसकी पंक्तियां करमा पर्व के माहौल के साथ सहज रूप से जुड़ जाती हैं।
किसने लिखा था यह लोकप्रिय गीत?
आज रे करम गोसाईं… को किसी एक व्यक्ति की रचना बताना मुश्किल है। उपलब्ध संदर्भों में-आज रे करम गोसाईं… को पारंपरिक लोकगीत के रूप में दर्ज किया गया है। लोकगीतों की सबसे बड़ी विशेषता ही यह है कि वे किसी एक लेखक की रचना न होकर पीढ़ियों की मौखिक परंपरा से आगे बढ़ते हैं।
इसी वजह से इसके मूल रचयिता का नाम निश्चित रूप से उपलब्ध नहीं है। अलग-अलग इलाकों में गीत के बोल, उच्चारण और धुन में थोड़ा अंतर भी देखने को मिलता है। यह बदलाव इसकी लोकपरंपरा का हिस्सा है।
कब है करमा पर्व
इस वर्ष करमा पर्व 22 सितंबर को मनाया जाएगा। पर्व से पहले ही गांवों में जावा तैयार करने और करम डाल की पूजा की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। करमा पर्व के दिन करम डाल को अखड़े या पूजा स्थल पर स्थापित किया जाता है। इसके बाद पारंपरिक तरीके से पूजा-अर्चना की जाती है।
करमा पर्व का संबंध प्रकृति और कृषि जीवन से भी गहरा है। झारखंड के ग्रामीण समाज में यह पर्व सामूहिक उत्सव का रूप ले लेता है। बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग सभी इसमें अपनी भूमिका निभाते हैं।
गीतों के बिना अधूरा है करमा पर्व
करमा पर्व में गीतों और नृत्य का विशेष महत्व है। शाम होते ही गांवों के अखड़े में महिलाएं और युवतियां जुटने लगती हैं। समूह में करम गीत गाए जाते हैं और मांदर की थाप पर पारंपरिक नृत्य किया जाता है।
इन गीतों में करम देवता की आराधना के साथ प्रकृति, खेती-बारी, भाई-बहन के रिश्ते, परिवार की खुशहाली और सुख-समृद्धि की कामना के भाव मिलते हैं। यही वजह है कि करमा गीत केवल पूजा का हिस्सा नहीं, बल्कि झारखंड के लोकजीवन की पहचान भी हैं।
इस तरह गाती हैं महिलाएं और युवतियां
करमा गीत गाने की भी अपनी खास परंपरा है। आम तौर पर महिलाओं या युवतियों का एक समूह गीत की पहली पंक्ति उठाता है। इसके बाद दूसरा समूह या बाकी महिलाएं उसी पंक्ति को दोहराती हैं। इस तरह सवाल-जवाब और दोहराव की शैली में गीत आगे बढ़ता है।
गीत के साथ मांदर, ढोलक और अन्य पारंपरिक वाद्य यंत्रों की ताल जुड़ती जाती है। महिलाएं और युवतियां एक-दूसरे का हाथ पकड़कर या कदम मिलाकर गोल घेरे में नृत्य करती हैं। जैसे-जैसे गीत और मांदर की ताल तेज होती है, नृत्य में भी उत्साह बढ़ता जाता है।
आदिवासी और कुड़मी समुदाय का प्रमुख पर्व
झारखंड में करमा पर्व मुख्य रूप से आदिवासी और कई ग्रामीण समुदायों का प्रमुख लोकपर्व है। इसे विशेष रूप से मुंडा, उरांव (कुड़ुख), हो, खड़िया, बिरहोर, कुड़मी/कुर्मी समुदाय में मनाने की परंपरा है। इसके अलावा छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार और मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी अलग-अलग समुदाय करमा/करम पर्व मनाते हैं।
आज रे करम गोसाईं घरे दुआरे रे… करमा पर्व का झारखंड में बेहद लोकप्रिय पारंपरिक लोकगीत है। यह गीत झारखंड की लोक-संस्कृति में पीढ़ियों से मौखिक परंपरा के जरिए जीवित है। उपलब्ध स्रोतों में भी इसे पारंपरिक करम गीत के रूप में ही दर्ज किया गया है। इसलिए इसके किसी एक निश्चित रचनाकार या कवि का नाम बताना मुश्किल है।
डॉ होलिका कुमारी मरांडी, प्राध्यापिका, संथाली विभाग, सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय, दुमका।



