पटना के आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय में जांच समिति को लेकर विवाद गहरा गया है। कुलसचिव ने शिक्षा विभाग के विशेष सचिव पर ‘हाथ तुड़वाने की धमकी’ देने का आरोप लगाते हुए कार्रवाई और निलंबन की मांग की है।
पटना। आर्यभट्ट ज्ञान विश्वविद्यालय (एकेयू), पटना में जांच समिति को लेकर विवाद लगातार गहराता जा रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने समिति के गठन की प्रक्रिया, अधिकार क्षेत्र और जांच की अवधि पर गंभीर सवाल उठाते हुए राज्यपाल सचिवालय को पत्र भेजा है।
कुलसचिव डॉ. नीरंजन प्रसाद यादव ने जांच समिति के समन्वयक और शिक्षा विभाग के विशेष सचिव पवन कुमार सिन्हा पर कथित अमर्यादित व्यवहार और धमकीपूर्ण भाषा के इस्तेमाल के आरोप लगाए हैं।
कुलसचिव के पत्र में दावा किया गया है कि जांच के दौरान विश्वविद्यालय अधिकारियों के साथ प्रशासनिक एवं संस्थागत मर्यादा के विपरीत व्यवहार किया गया। इसी क्रम में कुलसचिव को कथित तौर पर “हाथ तुड़वाने की धमकी” दिए जाने का आरोप भी लगाया गया है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने मामले को गंभीर बताते हुए संबंधित अधिकारी के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की मांग की है।
मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव तक पहुंचा मामला
मामले में एकेयू के कुलपति ने भी मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव को शिकायत भेजी है। शिकायत में जांच समिति के गठन की प्रक्रिया और उसके कथित अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई करने पर आपत्ति जताई गई है।
कुलपति ने जांच के दौरान विश्वविद्यालय अधिकारियों के साथ कथित अमर्यादित व्यवहार और धमकीपूर्ण भाषा के इस्तेमाल का भी उल्लेख किया है।
उन्होंने राज्य सरकार के शीर्ष अधिकारियों से तत्काल संज्ञान लेने, विश्वविद्यालय प्रशासन एवं कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने का अनुरोध किया है।
शिकायत में आरोप सही पाए जाने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ निलंबन समेत अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की गई है।
समिति के गठन पर ही उठ गया बड़ा सवाल
विश्वविद्यालय प्रशासन ने जांच समिति के गठन की वैधता को लेकर भी सवाल उठाए हैं। कुलसचिव का कहना है कि कुलाधिपति/राज्यपाल की अनुमति के बिना विश्वविद्यालय के खिलाफ जांच समिति गठित करना अधिकार क्षेत्र का विषय है।
राज्यपाल सचिवालय के अपर मुख्य सचिव स्तर से 27 जुलाई 2026 को जांच समिति गठित किए जाने का उल्लेख पत्र में है। शिक्षा विभाग के विशेष सचिव पवन कुमार सिन्हा को समिति का समन्वयक बनाया गया था।
समिति में गृह विभाग, अभियोजन निदेशालय और शिक्षा विभाग के अधिकारियों को भी सदस्य बनाया गया था। विश्वविद्यालय ने समिति के गठन की प्रक्रिया पर ही आपत्ति दर्ज कराई है।
15 दिन की जांच अवधि खत्म, फिर भी कार्रवाई पर सवाल
विश्वविद्यालय के अनुसार समिति को जांच पूरी करने के लिए 15 दिनों का समय दिया गया था। कुलसचिव के पत्र में दावा है कि निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद जांच की अवधि बढ़ाने से संबंधित कोई विधिवत आदेश या पत्र विश्वविद्यालय को नहीं मिला।
इसके बावजूद समिति की ओर से जांच प्रक्रिया आगे बढ़ाए जाने पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने आपत्ति जताई है। प्रशासन का सवाल है कि निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद समिति किस आदेश के आधार पर जांच जारी रख रही है। इसी बिंदु को लेकर विश्वविद्यालय ने राज्यपाल सचिवालय से मामले में स्पष्ट हस्तक्षेप की मांग की है।
12 सितंबर को विश्वविद्यालय पहुंची जांच टीम
कुलसचिव के अनुसार, 12 सितंबर को सुबह करीब 11 बजे जांच समिति के सदस्य एकेयू परिसर पहुंचे। समिति की ओर से विश्वविद्यालय प्रशासन से बड़ी संख्या में दस्तावेज और फाइलें उपलब्ध कराने को कहा गया।
विश्वविद्यालय का दावा है कि समिति ने करीब 1,344 पृष्ठों के दस्तावेज मांगे, जिन्हें उपलब्ध कराने में अधिकारियों और कर्मचारियों ने सहयोग किया।
इसके बाद भी अतिरिक्त फाइलों और अभिलेखों की मांग जारी रहने की बात कही गई है। इनमें GeM से संबंधित फाइलें और अन्य प्रशासनिक दस्तावेज शामिल बताए गए हैं।
दस्तावेज उपलब्ध कराने की प्रक्रिया के दौरान ही समिति के समन्वयक के व्यवहार को लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन ने आपत्ति दर्ज कराई।
‘हाथ तुड़वाने की धमकी’ के दावे से बढ़ा विवाद
राज्यपाल सचिवालय को भेजे गए पत्र में कुलसचिव ने पवन कुमार सिन्हा के व्यवहार को कथित तौर पर आपत्तिजनक और अमर्यादित बताया है।
पत्र के अनुसार, अधिकारियों को कथित रूप से धमकीपूर्ण भाषा में संबोधित किया गया। कुलसचिव ने विशेष रूप से “हाथ तुड़वाने की धमकी” दिए जाने का दावा किया है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे गंभीर मामला बताते हुए कहा है कि जांच के दौरान किसी पदाधिकारी के साथ इस तरह का व्यवहार संस्थागत गरिमा और सुरक्षा से जुड़ा विषय है। प्रशासन का कहना है कि ऐसी स्थिति जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े कर सकती है।
निलंबन की मांग पर धरने पर बैठे कर्मचारी
विवाद बढ़ने के बाद एकेयू प्रशासन और कर्मचारियों की ओर से धरना दिए जाने की बात सामने आई है। धरनारत कर्मियों की प्रमुख मांग पवन कुमार सिन्हा के तत्काल निलंबन की है।
कर्मचारियों का कहना है कि जांच के नाम पर किसी अधिकारी या कर्मचारी के साथ कथित अपमानजनक अथवा धमकीपूर्ण व्यवहार स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
उन्होंने आरोपों की निष्पक्ष जांच और दोष साबित होने पर नियमानुसार कार्रवाई की मांग की है। कर्मियों का कहना है कि जांच प्रक्रिया नियमों के तहत होनी चाहिए और उसमें सभी पक्षों की संस्थागत गरिमा का सम्मान जरूरी है।
राज्यपाल सचिवालय से लेकर सरकार तक हस्तक्षेप की मांग
कुलसचिव ने राज्यपाल सचिवालय से पूरे मामले में हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया है। वहीं, कुलपति ने मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव को भेजी शिकायत में जांच समिति की वैधता, अधिकार क्षेत्र और कथित धमकीपूर्ण व्यवहार का मुद्दा उठाया है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने समिति के गठन की प्रक्रिया, जांच की निर्धारित अवधि और उसके बाद की कार्रवाई की समीक्षा की मांग की है।
साथ ही, आरोपों की निष्पक्ष जांच कराने और आरोप सही पाए जाने पर संबंधित अधिकारी के खिलाफ निलंबन समेत अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की गई है। विश्वविद्यालय का कहना है कि मामले का असर प्रशासनिक कामकाज के साथ संस्थागत छवि पर भी पड़ सकता है।
आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं
हालांकि, पवन कुमार सिन्हा के खिलाफ “हाथ तुड़वाने की धमकी”, अमर्यादित भाषा और अधिकारों के कथित दुरुपयोग से जुड़े आरोप फिलहाल विश्वविद्यालय प्रशासन और कुलपति की ओर से विभिन्न अधिकारियों को भेजी गई शिकायतों में किए गए दावे हैं।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस समाचार ब्रीफ के आधार पर नहीं हुई है। संबंधित अधिकारी का पक्ष भी फिलहाल उपलब्ध नहीं है। ऐसे में मामले में आगे की कार्रवाई और संबंधित पक्षों के बयान महत्वपूर्ण होंगे।



