आईएएस अधिकारी डॉ. मनीष रंजन ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के विभिन्न पहलुओं पर आठ पुस्तकें लिखी हैं, जो आम जनमानस को एआई की उपयोगिता और प्रभावों को समझाने का प्रयास करती हैं। सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ न होते हुए भी, उन्होंने तीन साल के गहन अध्ययन और विदेशी विशेषज्ञों के साथ संवाद के बाद ये पुस्तकें रचीं।
रांची। एआई अर्थात कृत्रिम बुद्धिमता। ऐसी यह तकनीक है जिस पर आम मनुष्य के घर से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विमर्श है। इसके लाभ बताए जा रहे हैं तो हानि भी। इसी परिवेश में मानव सभ्यता को और सभ्य बनाने में एआई की उपयोगिता को समझाने की दिशा में आईएएस डाॅ मनीष रंजन ने बड़ा प्रयास किया है।
उन्होंने एआई से संबंधित अलग अलग विषय पर आठ पुस्तकें लिखी हैं। सभी आनलाइन प्लेटफार्म पर उपलब्ध हैं। डाॅक्टर मनीष रंजन न सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) के विशेषज्ञ हैं, न इसके पेशेवर। वे 2002 बैच के अखिल भारतीय सिविल सेवा के पदाधिकारी हैं। फिलवक्त रांची के श्रीकृष्णा सिन्हा लोक प्रशासन संस्थान में निदेशक हैं। एआई से जीवन को आसान बनाने, नौकरी गंवाने की आशंका के साथ नई नौकरी पाने की संभावना, सरकारी कामकाज को सुगम बनाने, शिक्षा हासिल करने में सुविधा होने जैसी बातें आम विमर्श में उन्हें लगातार सुनने को मिल रही थी। इसने उन्हें एआई पर अध्ययन को प्रेरित किया। तीन सालों तक जहां से ज्ञान मिला, उसे हासिल करने में लगे रहे। इसी कालखंड में वे उच्च शिक्षा के लिए विदेश गए। वहां कुछ एआई विशेषज्ञ उनके संपर्क में आए। एआई से जुड़ा उनका ज्ञान भंडार और भरता चला गया। और आगे बढ़ गया एआई से जुड़ी नई बातें सीखने का सिलसिला। हां, इस दौरान उन्हें जो ज्ञान मिलता था, उसे डायरी में दर्ज करते गए।
उनकी पढ़ाई का दायरा भी बेहद विस्तृत रहा। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले के गोल्डमैन स्कूल और ऑक्सफोर्ड के सईद बिजनेस स्कूल से लेकर जॉन्स हॉपकिन्स, कोलंबिया, फ्रैंकफर्ट और सियोल तक के संस्थानों में अध्ययन और प्रशिक्षण का अवसर मिला।
विदेश से झारखंड वापस आकर उन्हें लगा कि पुस्तकों के जरिए एआई की महत्ता को आम जनमानस तक पहुंचाने का जतन किया जाना चाहिए। किए भी।
लिखना शुरू किए तो आठ पुस्तकों की रचना हो गई। उन्होंने सिलिकॉन वैली की ताजा बहसें सुनी तो गांव के चौपाल की भाषा भी। शायद यही वजह है कि एआई जैसे जटिल विषय को समझने के बाद उन पर कलम चला सके हैं।
माता शिक्षिका थी जिनसे पुस्तक लेखन की मिली प्रेरणा
आईएएस मनीष रंजन मूलत: छपरा के रहने वाले हैं। उनके पिता सरकारी सेवक थे। माता शिक्षिका। माता हमेशा पुस्तक के पठन पाठन पर जोर देती थी। घर का वातावरण ऐसा था कि मनीष रंजन का बाल मन ही पुस्तक की महत्ता का मनन कर चुका था।
अविभाजित बिहार के प्रतिष्ठित नेतरहाट में दाखिला हो गया। दिल्ली के हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातक किए। आनंद के आईआरएम से प्रबंधन की डिग्री ली। इसी बीच अखिल भारतीय सिविल सेवा की परीक्षा उत्तीर्ण किए और देश में चौथा स्थान प्राप्त किया।
झारखंड में 24 सालों के दौरान हजारीबाग, देवघर, खूंटी, पाकुड़, लातेहार, गढ़वा जैसे जिलों की कमान संभाली।उत्कृष्ट कार्यों के लिए उन्हें प्रधानमंत्री पुरस्कार, राष्ट्रपति पुरस्कार और राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस पुरस्कार मिल चुके हैं।एआई पर लिखित पुस्तकों में यह सब
आठवीं पुस्तक विल आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इनस्लेव ह्यूमन्स बाय 2033 : खतरा मशीनों की बगावत का नहीं, इंसान के सोचना छोड़ देने का है। पुस्तक की चेतावनी दीवार पर टांगने लायक है, गुलामी बेड़ी पहन कर नहीं, सुविधा बनकर आएगी।
पहली पुस्तक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस: कॉन्सेप्ट्स एंड एप्लिकेशंस : बिना कोडिंग की एक भी पंक्ति के समझाती है कि मशीनें कैसे सीखती हैं। वे किस तरह बैंक, खेत, अस्पताल तथा बच्चों की कक्षा समेत कहां-कहां तक पहुंच चुकी हैं। इसका मूल वाक्य गांठ बांधने लायक है। इस युग के निरक्षर वे नहीं होंगे जो कोड नहीं जानते। निरक्षर वे होंगे जो सवाल पूछना नहीं जानते।
दूसरी पुस्तक एआई फॉर एवरीवन : यह एआई पुस्तकों की श्रृंखला का हृदय है। दुनिया में साढ़े चार अरब लोगों को पूरी स्वास्थ्य सेवा नहीं मिलती। 2030 तक 4 करोड़ 40 लाख शिक्षक कम पड़ेंगे। एआई ऐसी पहली तकनीक है जो सबसे दूर बैठे बच्चे तक न थकने वाला शिक्षक और गरीब की देहरी तक इलाज की सलाह पहुंचा सकती है। पुस्तक का सूत्र है कि उत्कृष्टता कभी सबके हिस्से नहीं आई, अब आ सकती है।
तीसरी पुस्तक द फ्यूचर ऑफ ह्यूमन्स इन द एज ऑफ एआई : यह पुस्तक आने वाले समाज का नक्शा तीन शब्दों में खींचती है- जुड़ाव, अनुकूलन और अवसर। पढ़ाई, कमाई और रिश्तों तक। भविष्य की दुनिया कैसी दिखेगी, इसका खाका दर्ज करने का प्रयास किया गया है।
चौथी पुस्तक 20 करियर्स दैट विल विन बाय 2033 : एआई के विस्तार के बाद हर घर में सबसे बड़े सवाल है, नौकरी बचेगी या नहीं? पुस्तक में बताया गया कि नई तरह की नौकरी का उदय होता जाएगा। पुस्तक में समझाने का प्रयास किया गया है कि मशीन से होड़ नहीं, साझेदारी कीजिए। अब जमाना सिर्फ डिग्री का नहीं, हुनरमंद होने का है।
पांचवीं पुस्तक विन द एआई डिकेड : ऐसे नियम जानते जाएंगे कि कार्य स्थल पर सप्ताह के पहले दिन सोमवार से ही काम आएंगे। हर नौजवान को एआई से कामकाज में समझदारी सिखाने की कोशिश की गई है।
छठी पुस्तक द न्यू साइकोलॉजी ऑफ लव : अकेलेपन के इस दौर में लाखों लोग रात गए मशीनों से मन की बात कहने लगे हैं। पुस्तक में इसके कारणों की व्याख्या करते हुए बताया गया कि मशीन आपका खयाल रख सकती है, पर आपका दिल का रिश्ता केवल इंसान से हो सकता है।
सातवीं पुस्तक एआई एंड द वॉर फॉर ट्रुथ : चंद क्षण की रिकॉर्डिंग से हूबहू आवाज की नकल और डीपफेक और वीडियो के झांसे से बचने के उपाय। समझाया गया कि एआई युग में कुछ मानने से पहले ठहरिए, किसी मैसेज को आगे बढ़ाने से पहले परखिए।



