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Atal Bharat News > झारखंड > रांची > रांची में रोशन होंगे लोहरदगा के दीये, दीपावली से पहले दिन-रात चाक चला रहे कुम्हार

रांची में रोशन होंगे लोहरदगा के दीये, दीपावली से पहले दिन-रात चाक चला रहे कुम्हार

AMRIT RAJ
Last updated: 2026/08/23 at 7:58 AM
AMRIT RAJ
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दीपावली के लिए लोहरदगा के कुम्हारों ने मिट्टी के दीये और खिलौने बनाने का काम शुरू कर दिया है. रांची तक है इन दीयों की भारी मांग.

लोहरदगाः दीपावली का त्योहार अभी कुछ समय दूर है, लेकिन कुम्हार समाज के परिवारों ने इसकी तैयारी शुरू कर दी है. कुम्हार परिवार मिट्टी के दीये, खिलौने और अन्य सामग्री बनाने में जुट गए हैं. उनका कहना है कि दीपावली नजदीक आते ही दीयों और मिट्टी के सामान की मांग अचानक बढ़ जाती है. ऐसे में कम समय में सभी ऑर्डर पूरे करना मुश्किल हो जाता है. इसी कारण इस वर्ष पहले से ही निर्माण कार्य शुरू कर दिया गया है.

Contents
रांची के व्यवसायियों से मिल रहे दीयों के ऑर्डरदेसी दीयों की बढ़ती मांग से कुम्हारों को उम्मीद1500 रुपये प्रति ट्रैक्टर पड़ रही मिट्टीबिजली चालित चाक से महिलाओं को भी मिला रोजगार

रांची के व्यवसायियों से मिल रहे दीयों के ऑर्डर

कुम्हार परिवारों के अनुसार लोहरदगा में तैयार होने वाले मिट्टी के दीयों की मांग केवल स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं है. रांची के दीया व्यवसायी भी यहां से बड़ी संख्या में दीयों का ऑर्डर देते हैं. समय कम रहने के कारण सभी मांग पूरी कर पाना कई बार मुश्किल हो जाता है. गणेश प्रजापति, रामदेव प्रजापति और महिला कारीगर शांति देवी ने बताया कि इस वर्ष उन्हें रांची से दीये बनाने का ऑर्डर मिल चुका है. समय पर ऑर्डर पूरा करने के लिए अभी से निर्माण शुरू किया गया है. दीपावली से पहले और भी ऑर्डर मिलने की उम्मीद है.

देसी दीयों की बढ़ती मांग से कुम्हारों को उम्मीद

कुम्हार समाज के लोगों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में स्थानीय स्तर पर बने मिट्टी के दीयों और खिलौनों के प्रति लोगों का रुझान बढ़ा है. चीनी सामानों के बहिष्कार के बाद कई परिवार दीपावली पर देसी दीयों और मिट्टी से बने सामानों को प्राथमिकता दे रहे हैं. इससे कुम्हार परिवारों को अपने पुश्तैनी व्यवसाय से अतिरिक्त आमदनी की उम्मीद बढ़ी है.

कुम्हारों ने बताया कि दीपावली और अन्य पूजा-पर्व के दौरान इस पुश्तैनी काम से अच्छी कमाई की संभावना रहती है. हालांकि मिट्टी की उपलब्धता और जलावन की बढ़ती कीमतों ने उत्पादन लागत बढ़ा दी है. पहले आसानी से मिट्टी उपलब्ध हो जाती थी और जंगल से जलावन की लकड़ी भी मिल जाती थी, लेकिन अब मिट्टी खरीदकर लानी पड़ती है. जलावन पर भी खर्च करना पड़ता है. इससे मिट्टी के सामान तैयार करने की लागत लगभग दोगुनी हो गई है.

1500 रुपये प्रति ट्रैक्टर पड़ रही मिट्टी

कुम्हार परिवारों ने बताया कि वर्तमान में एक ट्रैक्टर मिट्टी करीब 1500 रुपए में मंगानी पड़ रही है. इसके अलावा मिट्टी को तैयार करने, चाक चलाने, सामान बनाने और उन्हें पकाने में श्रम और ईंधन का खर्च आता है. लागत बढ़ने के बावजूद दीपावली और अन्य त्योहारों के दौरान मिलने वाले काम से होने वाली आमदनी के कारण परिवार इस पारंपरिक व्यवसाय को जारी रखे हुए हैं.

बिजली चालित चाक से महिलाओं को भी मिला रोजगार

कुमार प्रजापति ट्रस्ट के अध्यक्ष प्रेम किशोर प्रजापति के प्रयास से कई कुम्हार परिवारों को बिजली चालित चाक उपलब्ध कराया गया है. इससे कुम्हारों की मेहनत कम हुई है और उत्पादन में भी तेजी आई है. अब परिवार की महिलाएं भी घर पर दीये और मिट्टी के खिलौने बनाने में हाथ बंटा रही हैं. इससे महिलाओं को रोजगार का अवसर मिलने के साथ परिवार की आमदनी बढ़ाने में भी मदद मिल रही है.

कुम्हार परिवारों का कहना है कि इस वर्ष मिट्टी के दीयों की मांग अधिक रहने की संभावना है. इसी को देखते हुए दीपावली से काफी पहले ही दीये और अन्य मिट्टी की सामग्री बनाने का काम शुरू कर दिया गया है. उनका कहना है कि यदि स्थानीय बाजार और सरकारी स्तर पर सहयोग मिले, तो कुम्हार समाज अपने पारंपरिक व्यवसाय को और विस्तार दे सकता है.

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