• About Us
  • Contact Us
  • Privacy Policy
Atal Bharat  News
  • होम
  • देश और दुनिया
  • राज्य
    • झारखंड
    • बिहार
    • दिल्ली
    • गुजरात
    • उत्तरप्रदेश
  • शिक्षा
  • खेलकूद
  • मनोरंजन
  • राजनीति
  • स्वास्थ्य
  • चुनाव 2024
  • 🔥
  • झारखंड
  • साहिबगंज
  • बिहार
  • देश और दुनिया
  • राजनीति
  • दिल्ली
  • शिक्षा
  • रांची
  • Uncategorized
  • स्वास्थ्य
Atal Bharat  NewsAtal Bharat  News
Font ResizerAa
  • होम
  • देश और दुनिया
  • राज्य
  • शिक्षा
  • खेलकूद
  • मनोरंजन
  • राजनीति
  • स्वास्थ्य
  • चुनाव 2024
Search
  • होम
  • देश और दुनिया
  • राज्य
    • झारखंड
    • बिहार
    • दिल्ली
    • गुजरात
    • उत्तरप्रदेश
  • शिक्षा
  • खेलकूद
  • मनोरंजन
  • राजनीति
  • स्वास्थ्य
  • चुनाव 2024
Have an existing account? Sign In
Follow US
© 2024, atalbharatnews.com | All Rights Reserved.
Atal Bharat News > झारखंड > कौन हैं उरांव? कुड़ुख भाषा से धुमकुड़िया तक, जानिए झारखंड की इस जनजाति की पूरी कहानी

कौन हैं उरांव? कुड़ुख भाषा से धुमकुड़िया तक, जानिए झारखंड की इस जनजाति की पूरी कहानी

AMRIT RAJ
Last updated: 2026/09/11 at 2:05 PM
AMRIT RAJ
Share
SHARE

उरांव समाज की पहचान क्या है?

कुड़ुख भाषा, धुमकुड़िया की परंपरा, पाहन की भूमिका, करमा-जदुर जैसे पर्व, लोकगीत-नृत्य और सामुदायिक जीवन—ये सभी उरांव समाज की पहचान के महत्वपूर्ण हिस्से हैं.

Contents
उरांव समाज की पहचान क्या है?2011 की जनगणना में 17 लाख से अधिक आबादीकुड़ुख है उरांव समाज की भाषाधुमकुड़िया क्या है?करमा से जदुर तक, पर्वों में दिखती है संस्कृतिगांव की धार्मिक व्यवस्था में पाहन की भूमिकाटाना भगत आंदोलन से जुड़ा इतिहाससरना और ईसाई परंपरा, दोनों की मौजूदगीमुड़मा मेला क्यों है खास?उरांव समाज की पहचान क्या है?

झारखंड की विविध जनजातीय संस्कृति में उरांव समाज की अपनी विशिष्ट जगह है. बदलते समय के साथ जीवनशैली में बदलाव आया है, लेकिन अपनी भाषा और सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने की कोशिश आज भी जारी है.

उरांव झारखंड की एक प्रमुख जनजाति है, जिसकी आबादी 17 लाख से अधिक है. कुड़ुख भाषा, धुमकुड़िया, करमा-जदुर जैसे पर्व और पाहन की भूमिका इसकी पहचान हैं.

झारखंड की पहचान सिर्फ उसके जंगल, पहाड़ और खनिज संपदा से नहीं, बल्कि यहां सदियों से अपनी अलग संस्कृति और परंपराओं को संजोकर रहने वाले आदिवासी समुदायों से भी है. इन्हीं में एक प्रमुख समुदाय है उरांव, जिसे कुड़ुख नाम से भी जाना जाता है. अपनी भाषा, धुमकुड़िया की परंपरा, करमा-जदुर जैसे पर्व, लोकगीत-नृत्य और पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था के लिए पहचाने जाने वाले उरांव समाज की सांस्कृतिक विरासत बेहद समृद्ध है.

2011 की जनगणना में 17 लाख से अधिक आबादी

उरांव झारखंड की प्रमुख जनजातियों में शामिल है. 2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड में उरांव समुदाय की आबादी करीब 17.16 लाख थी. राज्य के कई इलाकों में इस समुदाय की बड़ी आबादी रहती है. खेती, जंगल और सामुदायिक जीवन से जुड़ी परंपराएं लंबे समय से इनके सामाजिक जीवन का हिस्सा रही हैं.

कुड़ुख है उरांव समाज की भाषा

उरांव समुदाय की पारंपरिक भाषा कुड़ुख है. यह भाषा उरांव समाज की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है. लोकगीतों, लोककथाओं और पारंपरिक अभिव्यक्तियों में कुड़ुख भाषा की समृद्धता दिखाई देती है.

कुड़ुख को लिखित रूप देने और संरक्षित करने के प्रयासों में तोलोंग सिकी लिपि का भी महत्वपूर्ण स्थान है. भाषा और लिपि के संरक्षण के प्रयासों ने उरांव समाज की सांस्कृतिक पहचान को आगे बढ़ाने में भूमिका निभायी है.

धुमकुड़िया क्या है?

उरांव समाज की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में धुमकुड़िया का खास महत्व रहा है. यह युवाओं के सामुदायिक और सांस्कृतिक प्रशिक्षण से जुड़ी व्यवस्था थी.

धुमकुड़िया के माध्यम से नई पीढ़ी को समाज की परंपराओं, रीति-रिवाजों और सामूहिक जीवन से परिचित कराया जाता था. इसलिए इसे उरांव समाज की पारंपरिक सामाजिक शिक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है.

करमा से जदुर तक, पर्वों में दिखती है संस्कृति

उरांव समाज के जीवन में पर्व-त्योहारों की महत्वपूर्ण भूमिका है. करमा जैसे पर्व सामूहिक उत्सव और सांस्कृतिक परंपरा से जुड़े हैं. गीत और नृत्य इन आयोजनों का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं.

जदुर भी उरांव समाज की पारंपरिक सांस्कृतिक परंपराओं में शामिल है. इन पर्वों और अनुष्ठानों के माध्यम से समुदाय अपनी पुरानी परंपराओं को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाता रहा है.

गांव की धार्मिक व्यवस्था में पाहन की भूमिका

उरांव समाज की पारंपरिक धार्मिक व्यवस्था में पाहन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. गांव के धार्मिक अनुष्ठानों और सामुदायिक आयोजनों में पाहन की जिम्मेदारी रहती है.

पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में अलग-अलग लोगों की निर्धारित भूमिकाएं थीं, जिनके माध्यम से गांव का सामुदायिक जीवन संचालित होता था.

टाना भगत आंदोलन से जुड़ा इतिहास

उरांव समाज के इतिहास की चर्चा टाना भगत आंदोलन के बिना पूरी नहीं होती. उरांव समुदाय के बीच से निकला यह आंदोलन शुरुआत में सामाजिक और धार्मिक सुधार से जुड़ा था. बाद में यह ब्रिटिश शासन के विरोध और स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़ गया.

टाना भगतों ने सादगी, अहिंसा और सामाजिक सुधार को महत्व दिया. इस आंदोलन ने उरांव समाज के इतिहास में अपनी अलग पहचान बनाई.

सरना और ईसाई परंपरा, दोनों की मौजूदगी

उरांव समाज में धार्मिक विविधता भी देखने को मिलती है. समुदाय का एक हिस्सा पारंपरिक सरना आस्था से जुड़ा है, जबकि कई उरांव परिवार ईसाई धर्म को मानते हैं.

धार्मिक मान्यताओं में अंतर के बावजूद भाषा, लोकसंस्कृति और सामुदायिक विरासत के कई पहलू उरांव समाज को एक साझा सांस्कृतिक पहचान से जोड़ते हैं.

मुड़मा मेला क्यों है खास?

उरांव समाज की सांस्कृतिक पहचान से जुड़े आयोजनों में मुड़मा मेला का विशेष महत्व है. यह आयोजन समुदाय की आस्था, परंपरा और सामुदायिक जुड़ाव को सामने लाता है.

मुड़मा जैसे आयोजन केवल धार्मिक या सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं हैं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़ने का माध्यम भी बनते हैं.

उरांव समाज की पहचान क्या है?

कुड़ुख भाषा, धुमकुड़िया की परंपरा, पाहन की भूमिका, करमा-जदुर जैसे पर्व, लोकगीत-नृत्य और सामुदायिक जीवन—ये सभी उरांव समाज की पहचान के महत्वपूर्ण हिस्से हैं.

झारखंड की विविध जनजातीय संस्कृति में उरांव समाज की अपनी विशिष्ट जगह है. बदलते समय के साथ जीवनशैली में बदलाव आया है, लेकिन अपनी भाषा और सांस्कृतिक विरासत को बचाए रखने की कोशिश आज भी जारी है.

Share This Article
Twitter Email Copy Link Print
Previous Article छपरा के यात्रियों को झटका; दिल्ली, मुंबई और चेन्नई की ट्रेनों में नो-रूम, रिग्रेट के चलते टिकट बुकिंग बंद
Next Article मंचूरियन ने ली जान, भोजपुर में बच्ची की मौत के बाद हड़कंप; दादी-भाई अस्पताल में भर्ती
Leave a comment

Leave a Reply Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

स्विटजरलैंड पहुंचा साहिबगंज की बर्ड सेंचुरी में हिंसा का मामला, पूर्व MLA ने झारखंड से दिल्ली तक पहुंचाई आवाज
September 14, 2026
‘e-KYC नहीं तो राशन बंद!’ झारखंड के 8.85 लाख लाभुकों पर मंडराया संकट, रांची-धनबाद सबसे आगे
September 14, 2026
10 साल लंबी वेटिंग लिस्ट!’ रामगढ़ के दुर्गा मंदिर में ‘डाक’ चढ़ाने की अनोखी परंपरा, 2037 तक होती है एडवांस बुकिंग
September 14, 2026
बरवाअड्डा थानेदार के साथ विवाद में MLA Jairam Mahto को बड़ी राहत, धनबाद कोर्ट ने दी अग्रिम जमानत
September 14, 2026

You Might Also Like

झारखंडसाहिबगंज

स्विटजरलैंड पहुंचा साहिबगंज की बर्ड सेंचुरी में हिंसा का मामला, पूर्व MLA ने झारखंड से दिल्ली तक पहुंचाई आवाज

By AMRIT RAJ
झारखंड

‘e-KYC नहीं तो राशन बंद!’ झारखंड के 8.85 लाख लाभुकों पर मंडराया संकट, रांची-धनबाद सबसे आगे

By AMRIT RAJ
झारखंड

10 साल लंबी वेटिंग लिस्ट!’ रामगढ़ के दुर्गा मंदिर में ‘डाक’ चढ़ाने की अनोखी परंपरा, 2037 तक होती है एडवांस बुकिंग

By AMRIT RAJ
झारखंडधनबाद

बरवाअड्डा थानेदार के साथ विवाद में MLA Jairam Mahto को बड़ी राहत, धनबाद कोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

By AMRIT RAJ
Atal Bharat  News

About US

AtalBharat TV is Digital Wave Media News Channel. We are guided by a clear vision, mission and the core Indian value of “Satyam Shivam Sundaram”. Amidst the threats of fakes and deep-fakes, we will strive to serve audiences across geographies with truth-based news and information.

Important Pages
  • About Us
  • Contact Us
  • Privacy Policy
Usefull Links
  • DNPA Code
  • Submit News
  • Advertise

Contact Address

Helpline: +91-6204459521
9471359719
Email: atalbharatnews@gmail.com
Address: Sahibganj, Jharkhand, 816109.

© 2024, atalbharatnews.com | All Rights Reserved.

Welcome Back!

Sign in to your account

Lost your password?