Thursday, February 22, 2024

झारखंड में मिली ‘बॉम्बे ब्लड’ ग्रुप वाली मरीज, बिहार से इलाज कराने देवघर आई… जानिए क्या है यह रेयर रक्त समूह

देवघर: साल 1952 में पहली बार सामने आए बेहद दुर्लभ रक्त समूह यानी ब्लड ग्रुप का मरीज देवघर में मिलने के बाद स्वास्थ्य महकमा चिंतित है। इस ग्रुप के ब्लड की उपलब्धता नहीं के बराबर है। साथ ही इस समूह के रक्त का मिलना भी काफी मुश्किल है। अब इस मरीज को भी बॉम्बे ब्लड ग्रुप के रक्त की जरूरत है। इस रक्त समूह की पहचान वर्ष 1952 में उस वक्त हुई थी, जब बंबई (मुंबई) में एक मरीज को खून चढ़ाने के लिए टेस्ट की प्रक्रिया पूरी की जा रही थी।


बिहार के बांका जिला की है ‘रेयर’ मरीज
देवघर में जिस महिला मरीज को बॉम्बे ब्लड ग्रुप के रक्त की ज़रूरत है वह बिहार के बांका जिला अंतर्गत कटोरिया थाना क्षेत्र की रहने वाली बहादी हेम्ब्रम हैं। बहादी के शरीर मे कमजोरी और लगातार तबीयत खराब रहने की वजह से पति हीरालाल सोरेन ने एक निजी क्लिनिक में भर्ती कराया था।, जहां डॉक्टर ने हीमोग्लोबिन की जांच करने के बाद रक्त चढ़ाने की बात कही। इसके बाद मरीज को लेकर पति सदर अस्पताल पहुंचा और ब्लड बैंक में अपने रक्त समूह की जांच कराई। जांच रिपॉर्ट में खून मैच नहीं हुआ, इसके बाद ब्लड बैंक के टेक्नीशियन ने जब एंटीजन किट से जांच की तब जाकर पता चला कि, महिला का ब्लड ग्रुप बेहद ही दुर्लभ बॉम्बे ग्रुप है।

बॉम्बे ग्रुप के देश में महज 400 मरीज
बॉम्बे ब्लड ग्रुप के बेहद दुर्लभ माने जाने के पीछे भी खास वजह है। इस ग्रुप का रक्त समूह गुजरात और मुम्बई के अलावा देश के अन्य हिस्सों में नहीं के बराबर पाया जाता है। यह इतना दुर्लभ है कि, भारत के सवा सौ करोड़ की आबादी में इस ब्लड ग्रुप के महज 400 लोग ही मौजूद हैं।

1952 में पहली बार हुई थी इस दुर्लभ रक्त समूह की पहचान
साल 1952 के दौरान मुम्बई के किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल में भर्ती एक मरीज को खून की जरूरत थी। इसके लिए रक्त देने वालों के ग्रुप की पहचान के लिए जांच शुरू हुई लेकिन, मरीज के खून से किसी का भी मरीज के ब्लड ग्रुप से मैच नहीं किया। एक एक कर करीब 160 लोगों के रक्त समूह की जांच की गई, जिसके बाद एक शख्श का खून मरीज के खून से मिल गया और वह शख्श बॉम्बे का ही रहने वाला था। इसलिए इस रेयर ग्रुप का नाम ही बॉम्बे ग्रुप पड़ गया।

मरीज के लिए बाहर से मंगाना पड़ेगा ब्लड
ब्लड बैंक के प्रभारी डॉक्टर विधु वीबोध कहते हैं कि, यह ब्लड ग्रुप इतना दुर्लभ है, जिसका मिलना बेहद मुश्किल है। मरीज के परिजन को अब इस बात की चिंता सता रही है कि अब वह इस रक्त का इंतज़ाम कहां से और कैसे करें। इस ब्लड ग्रुप की पहचान होने से मरीज का इलाज कर रहे डॉक्टर भी परेशान हैं। डॉक्टरों के बीच भी यह चर्चा का विषय बना हुआ है। मरीज के ब्लड को न तो किसी को दिया जा सकता है और न ही किसी अन्य ग्रुप के ब्लड को मरीज को दिया जा सकता है।

14वी सदी में हुई थी इस रेयर ऑफ द रेयरेस्ट ग्रुप की पहचान
जानकर बताते हैं कि, 14वीं सदी में यूनान से समुद्र के रास्ते कुछ लोग भारत आए थे। इनमें इस रक्त समूह की पहचन हुई थी। डॉक्टर विधु विबोध बताते हैं कि अगर दूसरे ग्रुप के ब्लड मरीज को चढ़ाया गया तो यह मरीज के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। डॉ बिधु विबोध ने NBT डॉट कॉम को बताया कि मरीज के माता या पिता के पक्ष से किसी न किसी सदस्य में इस रेयर ऑफ द रेयरेस्ट ग्रुप के ब्लड पाए जाने की संभावना होती है, अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर अन्य तरीकों से हीमोग्लोबिन के स्तर को बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा।

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