Sunday, April 14, 2024

Office Of Profit नियम क्या है, जिसमें फंस गई झारखंड के CM हेमंत सोरेन की कुर्सी, जानिए

रांची : झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की कुर्सी लाभ का पद (Office Of Profit) मामले में फंस गई है। सबसे पहले बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवर दास ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मुख्यमंत्री पर अपने नाम से खनन पट्टा लेने का आरोप लगाया था। साथ ही इसे ऑफिस ऑफ प्रॉफिट का मामला बताते हुए उनकी विधानसभा सदस्यता रद्द करने की मांग की थी। बाद में बीजेपी नेताओं ने राज्यपाल रमेश बैस से इसकी शिकायत की और राज्यपाल ने इस पर भारत निर्वाचन आयोग से मंतव्य मांगा। जिसके बाद सबसे पहले 3 मई को चुनाव आयोग की ओर से नोटिस जारी कर मुख्यमंत्री से जवाब मांगा गया था। अब फैसले की घड़ी है। ऐसे में इस कानून के बारे में विस्तार से जानिए।

क्‍या है ‘लाभ का पद’ Office of Profit?
Office Of Profit (लाभ का पद) इसके चक्कर में कई सांसद और विधायक कुर्सी गंवा चुके हैं। अब झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की कुर्सी फंस गई है। संविधान के अनुच्छेद 102 (1) A के मुताबिक कोई भी सांसद या विधायक ऐसे किसी पद पर नहीं रह सकते जहां वेतन, भत्ते या प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष रूप से या फिर किसी दूसरी तरह के फायदे मिलते हों। भारतीय जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 9 (A) के तहत भी सांसदों और विधायकों को किसी दूसरे मद से लाभ या अन्य पद लेने पर रोक रहती है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 संसद सदस्‍यों और राज्य विधानमंडल के सदस्‍यों के भ्रष्ट आचरण और अन्य अपराधों के खिलाफ भी कार्रवाई का अधिकार देता है।

जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 क्या है?
संविधान के अनुच्छेद 327 के तहत जनप्रतिनिधत्‍व अधिनियम, 1951 को संसद ने पारित किया है। ये इन बातों की पुष्टि करता है कि संसद और राज्य विधानसभाओं में सदस्य बनने के लिए क्या योग्यताएं होती है। धारा 8 (4) में ये भी प्रावधान है कि कोई भी जनप्रतिनिधि अगर किसी भी मामले में दोषी ठहराए जाने की तिथि से तीन महीने तक अदालत में अपील दायर करता है, तो उसका निपटारा होने की तारीख तक वो अपने पद से अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकता।

इन वजहों से प्रतिनिधि हो सकते हैं अयोग्य

  • चुनाव से जुड़े अपराध और इलेक्शन में भ्रष्टाचार के दोषी करार दिए जाने पर सदस्यता जा सकती है।
  • किसी भी अपराध में दोषी करार दिए जाने और दो साल की जेल की सजा मिलने पर अयोग्य हो जाएंगे।
  • भ्रष्ट आचरण के दोषी पाए जाने पर सांसदी या विधायकी जा सकती है।
  • भ्रष्टाचार या राष्‍ट्रद्रोह के मामले में अयोग्य हो जाएंगे।
  • किसी सरकारी कंपनी से प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष लाभ लेने पर कुर्सी चली जाएगी।
  • रिश्वतखोरी के चलते भी इस्तीफा देना पड़ सकता है।
  • सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने, छुआछूत, दहेज सरीखे सामाजिक अपराध में संलिप्‍तता साबित होने पर इस्तीफा देना होगा।

राज्यपाल के पास अयोग्य घोषित करने का अधिकार
संविधान के अनुच्छेद 192 (2) में राज्यपाल को किसी जनप्रतिनिधि को हटाने के मामले में चुनाव आयोग से मशविरा मांगने का अधिकार हासिल है। आयोग की सलाह राज्यपाल अपना निर्णय लेते हैं। जबकि जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 8ए, 9 और 9ए का उल्लंघन होने या लाभ के पद पर रहते हुए भ्रष्ट आचरण अपनाने पर संसद या विधानसभा की सदस्यता खत्म करने का प्रावधान है।

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